आलोकित जहाँ बरसाएं नूर!
बादलों की ओट से झाँके,
मदन सम "शरद का चाँद"!
लावण्यवती निशा बहके,
देख मदमस्त पौरुष, आल्हाद!
क्षीर-नीर सी चांदनी में नहाई,
षोडशी पूनम की रात!
पलकों के झूलों में झूले,
मस्तमौला कुसुम से जज़्बात!
शरद पूर्णिमा की रात में,
बांसुरी बजाए राधेश्याम!
कालिंदी तट पे हो अधीर ...
राधा जपे कान्हा नाम!
श्रीकृष्ण मिलन तरसे मीरा,
जहर लगे अमिरस धारा!
हरि सुमिरन से हो उजाला!
विषधर बने सुकोमल पुष्पमाला!
झर झर झरे झरने से मोती,
चमके मुखमंडल, नेत्र-ज्योती!
ढलती रात, ढले वक्षों से चुंदड़!
वृक्षों से पत्तों से, सपने अल्हड़!
शरद चंद्रमा की रानी, रूपसी नार
सज-धज चली छोड़ बाबुल द्वार!
बाहें फैलाए मुस्कुराया, निशा-चित-चोर,
एक-दूजे में समाए चांद-चकोर!
स्वरचित तथा मौलिक:
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई महाराष्ट्र!