शीर्षक : यादों के दीये...
गुज़रे थे इन्ही तंग गलियों से हम बार बार!
यादों के दीये जल रहे थे रोशनी ले उधार!
मद्दीम थी चांदनी,चाँद दरख़्तों के उस पार!
कजरारी रात में, कैसे हो सनम का दीदार?
महकी चम्पा, चमेली, इतराया रक्तिम गुलाब,
परिंदे भी पंख समेटने लगे देख बन्दे का रुबाब!
बंद दरवाजों से झाँक रही थी आँखे हजार!
गली-गली सजा किस्से, कहानियों का बाज़ार!
ओढ़ चुनर पगलाई सी, चली प्रियतम के द्वार!
हया की लाली लगने लगी, कुंकुंमवर्णी शिंगार!
माता-पिता की दहलीज़ लांघ, निकली षोडशी नार!
पीछे छुटी बाबुल की यादें, बचपन का नन्हा संसार!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |