सूर्य-रश्मियों की गुदगुदी से परेशान वज्र आँखें मल रहा था तभी बाबा की आवाज़ उसके कानों में पड़ी और वह झट से उठ कर बैठ गया! दरवाज़े पर खड़ी 'आजी' मुस्कुरा रही थी! "पोरा! स्वप्न बघत होतास का रे? " उसके चेहरे की मुस्कुराहट वह निहार रही थी...यह वज्र को कहाँ पता था?
उसने हौले से झुक कर प्रणाम किया और बाहर दिवाणखाने की ऒर चल पड़ा! बाबा भी उठ कर आजी का सहारा लें आराम कुर्सी पर बैठ गए थे! उसे देखते ही उनकी आँखें चमक उठी! उसने उन्हें भी प्रणाम किया और छोटू को पेस्ट और ब्रश देने को कह कर वह दादाजी के पास बैठ गया! बाबा उसके बालों में उंगलियाँ घुमाते-घुमाते बोलने लगे, " पोरा! किती दिवस झाले न तुला भेटून! म्हटलं..प्रतिभा ! घेऊन चल की मुम्बई ला! पोर गुणा ची.. तुझी आई रे पोरा! घेऊन आली की आम्हाला लगेच!"
बाबा और वज्र का मानों जनम-जनम का रिश्ता था! चुम्बक से खींचे चले आते थे एक-दूजे के पास! तभी वज्र की आई सब के लिए चाय-नाश्ता लेकर आई! वज्र भी तैयार हो कर आ गया था आबा के साथ!
आबा ने बाबा को नाश्ता कर जल्दी तैयार होने को कहा और खुद फ़ोन में लग गए...वज्र को कुछ सोचने का मौका ही नहीं दिया आबा ने! दादा-दादी और आबा डॉक्टर के यहाँ चले गए और वज्र माँ के साथ अपने कमरे की तरफ चल पड़ा! वज्र की तबियत में सुधार देख प्रतिभा जी बहुत खुश थी..बेटा अब कॉलेज जा रहा हैं और नाटक में भी भाग ले रहा हैं यह सुन कर वह फूले नहीं समाई लेकिन दूसरे ही पल बाबा की चिंता ने उनके चेहरे की रंगत को फीका कर दिया! "पीकलं पान!" वह मन ही मन बुदबूदा रही थी...कब वक़्त की आँधी आएं और सूखे पत्ते को उड़ा ले जाएं... क्या पता! वज्र के सामने तो दोनों ने प्रसन्नता का मुखौटा चढ़ा लिया था मगर हकीकत कुछ और थी... आबा के कहने पर ही बाबा को स्पेशलिस्ट डॉक्टर को बताने के लिए यहाँ लाया था उन्होंने... वज्र तो एक तोड़ था उनकी ज़िद का!
प्रतिभा जी ने अन्नपूर्णा को सास-ससुर जी के लिए नरम भाकरी और भाजी बनाने को कहा और चावल के साथ मुंग की दाल बनाने को कह कर वह नहाने चली गई!
वज्र ने वैदेही को फ़ोन लगाया! आज चार बजे विभा के यहाँ जाने का निश्चित हो चूका था! सभी छोटे बच्चे सा इंतजार करते कि कब मिलना हैं इस बहाने! वज्र ने माँ, दादा-दादी के मुम्बई आने की खबर दी तो वैदेही भी बहुत ख़ुश हुई!
वह भी बाबा के वाड़े में ही तो खेल-कूद कर बड़ी हुई थी! वाड़े के बड़े-बड़े खम्बे ही तो साक्षी थे उनकी छुपम-छुपाई के! यहीं पर तो वह वज्र की आँखों पर पट्टी बांधती और उसे गोल-गोल घुमा कर छोड़ देती..पकड़ा-पकड़ी के खेल में! यादों के रेशमी पर्दे हवा के साथ झिलमिला रहें थे तभी बिप बजने लगी तो वज्र ने बाद में फ़ोन करता हूं कह कर फ़ोन काट दिया.. आबा फ़ोन लगाने की कोशिश कर रहें थे.. उन्होंने माँ को फ़ोन देने को कहा! माँ कमरे में चली गई और आबा से बात करने लगी... बाबा को ग्लोबल हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया गया था...आबा ने भोजन वगैरा निपट कर प्रतिभा जी को छोटू के साथ हॉस्पिटल में आने को कहा था ! सभी ने भोजन किया और छोटू को साथ लेकर माँ हॉस्पिटल चली गई!
आधे घण्टे बाद आबा और आजी घर पहुँच चुके थे! दोनों ने जल्दी-जल्दी भोजन किया और कुछ देर आराम करने कमरे में चले गएँ! वज्र ने आजी को देख पूछा, "बाबा आले नाहीत?" आजी ने कहा बाबा को टेस्ट के लिए भर्ती किया हैं.. काम होते ही आ जाएंगे! वज्र अपने कमरे में चला गया! आबा भी थोड़े सहज़ हो गए और अपने कमरे की ऒर चल पड़े!
विभा आज बहुत उत्साहित थी! कल ही उसकी मम्मी जयपुर से मुम्बई आई थी उसे मिलने तथा अपनी सहेली की बेटी की शादी की खरेदी करने! हॉस्पिटल में विभा के दोस्तों के परिजनों से उसकी पहचान हो चुकी थी!
चार बजे सब पहुँच चुके थे! यश ने आते ही चौका मारा, " आंटी जी! कहाँ हैं जयपुर की प्याज़ की कचोरी और मलाई घेवर? सब विभा ही खा गई या कुछ हमारे लिए छुपा कर रक्खा था उसकी ललचाई नज़रों से? विभा की मम्मी खिलखिला कर हँस पड़ी और बोली, " सही पकड़ा तुमने! कचोरी तो सारी ख़त्म हो गई ! ये मलाई घेवर छुपा कर रक्खा हैं सब के लिए.. फटाफट खा लो... वरना.. और सभी टूट पड़े घेवर पर..
विभा की मम्मी, पद्मावती जी का जिया खुशी से बाग-बाग हो रहा था! उनकी थकान मानों फुर्र हो गई थी! उन्होंने अपनी बैग खोली और चारों को जयपुर की प्रसिद्ध रजाईयां भेंट दी! सभी गदगद थे उनकी मनुहार और प्यार को महसूस कर...
विभा बोल पड़ी, "अब हम चटोरों की पेट पूजा तो हो गई.. अब चले प्रैक्टिस करने?" सभी चल पड़े दूसरे कमरे की ऒर.. पद्मावती जी को हाथ हिला-हिला कर बाय-बाय करते-करते और फ्लाइंग किस देते-देते!
सब से पहले तो कौनसा रोल कौन करेगा, यह तय करना था! सभी ने आपस में विचार-विमर्श किया और यश को मदारी का रोल दिया गया! वज्र को कम उत्तेजना वाला धीर-गंभीर डॉक्टर का किरदार देना निश्चित हुआ! अब जम्हूरे की बारी थी... कौन बनेगा जम्हूरा? "विभा को बनाएंगे यार जम्हूरा! सबकी बोलती बंद कर देगी यह!" सभी यश की बात पर हँसने लगे! विभा ने भी जम्हूरे की तरह गर्दन हिलाई और बोल पड़ी, "जी मालिक!" अब वैदेही की बारी थी.. उसे 'बाबा' का किरदार करना था! सबने एक साथ सहमति दी! पहला पडाव पार हो चूका था और अगली मीटिंग में सब को संवाद याद कर आना था! विभा ने सभी को पुरे नाटक के ज़ेरोक्स की प्रति दी और सबको अपने संवाद याद कर आने को कहा! अगली मीटिंग यश के यहाँ तय थी! सभी मुस्कुरा रहें थे लेकिन अंदर ही अंदर सबको विनय की कमी खल रही थी! उसका उत्साह, उसकी विषय को गहराईयों में जा कर समझने की आदत बहुत याद आ रही थी, फिर भी सभी चेहरे पर शिकन तक आने नहीं दे रहें थे!
आखिर बीत चूका सो बीत चुका था.. अब पीछे देखने से क्या बदलने वाला था? कुछ भी तो नहीं! लेकिन उसके कार्य को आगे बढ़ाते रहने से उसकी आत्मा को शान्ति जरूर मिलेगी, यहीं सोच कर सब जुटे थे गिलहरी के प्रयास में..
सर्दियों की शाम में गोधूलि बेला में ही अँधेरे सूरज को विदा कर लौट चुके थे! वज्र और विभा ने यश को साथ लिया और उसे घर के नीचे छोड़ वह चल दिएँ अपने घरों की ऒर..वो जानते थे उनके अपने उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रहें होंगे...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |
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