अंतस के भीतर की।
नफरत के पौध की।
क्रोध रूपी कंटक की।
पराली जलाइए।।
खल दल मान हरे।
पापी को भी क्षमा करे।
ममता अंतस भरे।
अमृत पिलाइए।।
ज्ञान अमि घट भरो,
दीन-दुखी कष्ट हरो
स्नेह भाव सँग धरो,
समता फैलाइए।।
भव-भव तार दियो।
कर्म बन्ध तोड़ लियो।
संयम पथिक जियो।
दीपक जलाइए।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।