असत्य की जय जयकार जहां,
सत्य दुर्लभ है वहां!
अपराधी करे दबंगाई यहां,
पीड़ित दुबक कर बैठा तन्हां!
बिन पैंदे के लोटे से लोग जहां,
हवाओं संग रूख बदले यहां!
चट्टानी इरादों वाले विरला,
कुर्बान क्यों हो चंद जांबाज़ भला?
भ्रष्टाचार, रिश्वत का बोलबाला,
दवाई महंगी, सस्ती हाला!
दुर्लभ शुद्ध जल, मुख निवाला!
अन्नदाता घर ठण-ठण गोपाला।
सरस्वती-लक्ष्मी बहनें सगी,
भक्तों के घर क्यों बजे डुगडुगी?
कुबेर सा धनी, करे जालसाजी,
गरीब के घर, ठहरे न लक्ष्मीजी!
अनाज से लदे ट्रक-गोदाम ,
दलाल फिर भी पैसे का भूखा!
स्वेद-खून बहा, मिले न दाम,
स्वार्थ की नहीं, लक्ष्मणरेखा!
"बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ",
किस-किस से अस्मत बचाओ?
खिली कलियां देख मुस्काऊ,
पैरों तले कुचली देख रोऊं?
कानून-व्यवस्था बंधुआ जहां,
न्याय की धुंधली सी उम्मीद कहां?
निस्तेज तेजोमय सूरज जहां,
नव भोर का सृजन दुर्लभ वहां!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र!