आलोक...
शीर्षक : आलोक..
                    
खुद पिघल कर मोम सा,
वक़्त की आँच में हुएँ स्वाहा:
अस्तित्व लगा दाँव पर,
लौ जलाई ज्ञान-विज्ञान की!
 
ब्रह्माण्ड आलोक से भरा ,
भण्डार ज्ञान का समृद्ध, भरा-पूरा ,
परिणाम समर्पण-त्याग का,
ज्योतिर्मय भविष्य युवाओं का!
 
थाम कर रश्मियों का छोर,
उड़ान भर अंतरिक्ष की ओर,
महसूस कर स्वर्णिम भोर!
आजमा बहुमुखी प्रज्ञा का जोर!
 
युवाओं के लिए है नीला आकाश, 
स्वर्ण-अक्षरों में अंकित हो प्रयास!
साहस, जीवट से जला दो दीप!
दीपमालाओं से जगमगा दो द्वीप!
 
उजियारे पर हो सबका अधिकार,
महल-कुटीर देश में या समंदर पार!
धर्म, संप्रदाय, जाति की न हो दीवार,
सबके लिए खुले ज्ञान के उन्नत द्वार!
 
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|
 
 
 
इस पर लोग क्या कह रहे हैं