चल रहे वर्षों से हैं जिसके लिए वो दूर कितने जिंदगी के छोर हैं,
सीधा रहे तो तेज थोड़ा चल सकूँ
इस रास्ते में और कितने मोड़ हैं,
सुनता हूँ सब भागते थक जाते हैं
मैं थक रहा हूँ चाल धीमी चलने से,
यदि दिख रहा है छाँव वीरां रास्ते में
मृगतिषा है बस मरू की, धूप जलने से
क्या करूँ!
अफ़सोस?
कि मंजिल दूर तक दिखती नहीं या
संतुष्ट हो जाऊं कि कोशिशें पूरी रहीं।
महासमर है, ये समय जो चल रहा है
चक्रव्यूह में अभिमन्यु सा उलझा पड़ा है,
न कवच-कुण्डल है, न कोई सारथी है
अब रण में बस, मन अकेला ही खड़ा है,
क्या करूँ!
अब दिख रही इस हार को स्वीकार लूँ या
लड़ते रहूँ और सपने को नया आकार दूँ।
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