अपनापन!
गमले के पौधे पर डोलती गुलाब की कली भी सूरज की रश्मियों के स्पर्श से खिल उठती है, अपने हरे-हरे पटों को खोल कर, पंखुड़ियां फैला कर मुस्कुराने लगती है ...तो हम तो ठहरें सामाजिक प्राणी! क्या किसी के अपनापन से हमारी पांखें नहीं खिलेगी? अपनों के दो मीठे बोल सुन क्या हमारी दिन भर की थकान उड़न-छूं नहीं हो जायेगी ? अपनों का अपनेपन का एहसास क्या हमें शिद्दत से जीने के लिए उत्साहित नहीं करेगा ?
घर की बाल्कनी में स्वछंद फैला मनीप्लांट भी जब हम २-४ दिन बाहर गांव चले जाते हैं तो हमारे आने का इंतज़ार करता है और जब उसे पानी देकर हाथों से सहलाते हैं तो पुलकित, हर्षित हो झूम उठता हैं! 'ओला' से उतरते ही रॉकी भों-भों कर करीब आ कर कुदने लगता है और लिफ्ट का दरवाज़ा खोलते ही 'मनी माऊ' हमसे पहले लिफ्ट में घूस जाती है और लिफ्ट के रुकते ही तेजी से सबसे पहले बाहर निकल कर म्याऊं, म्याऊं कर घर सिर पर उठा लेती हैं तो हम तो इंसान हैं! एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं!
यह अपनापन, प्यार ही तो है जो हमें सब से जोड़ कर रखता हैं, एक-दूसरे के खुशी-गम में शरीक होने को प्रोत्साहित करता हैं!
अपनापन ही तो है जो इन्सानियत को जिंदा रखता है! अपनापन ही तो है जो ह्रदय में जलतरंगों की स्वरलहरियों को जतन कर संजोएं रखता हैं..भले ही रिश्ता खून का हो या दिल का, इंसानी हो या रुहानी! शर्त सिर्फ़ इतनी कि उसकी नींव में अपनापन हो, निस्वार्थ भाव हो!
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई।