गलती सुधारनी होगी...


गलती सुधारनी होगी...

आज उसने अपने पैतृक घर में कदम रखा। अपने माता पिता की इकलौती वारिस थी वह। कितना सुंदर, सुहावना था यह घर। अपने परिवार में ही रमी रही वह। कभी ध्यान ही नहीं दिया उसने। अपना भी तो ध्यान कब रखा उसने।
आज विभावरी ने जैसे ही घर का दरवाजा खोला, करकर की आवाज आयी। लगा जैसे, उसका जीवन भी बेसुरा हो गया है।
मेरा होनहार बेटा,  मेरा लाडला... आशुतोष उसके अत्यधिक लाड प्यार से ही बिगड गया था। खाना, पीना, पिलाना, दोस्तों का जमघट लगा रहता। धीरे धीरे जमापूंजी खत्म होती गयी। पानी सर से उपर बहने लगा। क्या करे विभावरी।समाज, रिश्तेदारों से ली उधारी  तो चुकानी ही पडेगी। कई बार कपूत के कारण शर्मसार होती वह। और बहू भी अत्यधिक खर्चीली। कभी गंभीरता से न उसकी बुरी आदत छुड़ने का प्रयास किया, न सही राह बतायी। पति-पत्नी जब तक उसका बैंक बैलेंस था, मीठा बर्ताव करते रहे। 
आज तो हद ही हो गयी। दोपहर की चाय बहू बडबडाते हुए दे गयी। 
"फोकट का खाने को चाहिए बैठे-बैठे।"
" अरे, सारा बजट कैसे बिगड जाता है पंद्रह बीस दिनो ही?"
दिल को ठेस ऐसी लगी कि अब एक पल भी यहां रहना उसके लिए मुश्किल था। दम घुटने लगा था उसका।
अब वह यहां रहेगी। अपने घर में। अपने लिए जियेगी। माता-पिता के नाम से पाठशाला खोलेगी। नन्हे बच्चों के मन में संस्कार बीज बोयेगी। अपनी गलती सुधारने की सार्थक कोशिश करेगी।

स्वरचित  मौलिक लघुकथा
चंचल जैन
मुंबई,  महाराष्ट्र
इस पर लोग क्या कह रहे हैं