मजदूर.. कितना मजबूर!
अकेलेपन के अंधेरों में,
भटकता प्रवासी मजदूर,
घर से दूर, थक कर चूर,
मजदूर, कितना मजबूर!

दो वक़्त रोटी की खातिर,
दुत्कार सहने को मजबूर!
पेट के गड्ढे भरता मजदूर, 
ढूंढ़े बासी रोटी के दो कौर!

सगे सम्बन्धी न परिवार साथ,
न अपनों से अंतरंग बात!
आँगन मुस्कुराता न गुलमोहर, 
न गुलाल उछालती भोर!

जिनके खून-पसीने से निखरा,
देश का उज्वल भविष्य!
वहीं भटके दर-बदर!
ढूँढ़ता रह गया अन्न-वस्त्र-घर!

ऊँची अट्टालिकाओं का चितेरा,
लगाएँ घास-फूँस के घर का फेरा !
परिंदे डाले बरगद पे डेरा,
मजदूर का कहाँ है बसेरा?

फटे चीथड़े में श्रमिक की लुगाई,
बच्चे खेले धूल में छुप्पम-छुपाई!
बुढ़ा बापू तपेदिक का रोगी, 
माई महामारी की भुक्त-भोगी।।

ठेकेदार की बुरी नज़र से बचती,
बालू, रेत, पत्थर सिर पर उठाती,
मेहनताने के लिए लड़ती-झगड़ती,
प्रवासी मजदूर की लाचार पत्नी।

बूढ़ी, थकी आँखों में प्राण लिए,
दवा-दारू की चिंता किए,
उदास चेहरे पर झुर्रियाँ लिए,
देहरी पर फड़फड़ाते दिएं।।

मिट्टी के घोड़ों की फ़ौज लिए,
पुरानी किताबों की चाहत लिए,
पहाड़ी पर मेला देखने के लिए, 
माई-बापू संग बच्चें उतावले भए!

विकास के दावों में उलझी,
मेहनतकश की जीवन-डोर!
क्या आज नहीं तो कल होंगी,
श्रमयोगी की सुनहरी भोर?

क्या रोक पाएंगे हम,
दर्द का सन्देशा लाती हवा?
क्या रोक पाएंगे हम,
गाँव से शहर की ओर चला कारवाँ?
क्या रोक पाएंगे हम,
शोषण, अत्याचार, दमन की पुरवा?

कुछ बदलेगा हाल मजदूरों का?
देश के मजबूत पत्थरों का?
जमीन से जुड़े कारीगरों का?
राष्ट्र के कल के रच्चनहारों का?
   
स्वरचित तथा मौलिक
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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