वसंत पंचमी!
खिला-खिला है गुलमोहर, 
सूरजमुखी डोले चहुँओर!
छटा लाल-केसरिया मन भाए, 
बसंती बहारें खुशियां लाए!
मोतियों से लदी बालियां, 
झूम उठी केसर की डालियां!
महका रंग-बिरंगे फूलों से उपवन,
भंवरों ने डाले डोरे, बहका यौवन!

कामदेव ने चलाएं नयनों के तीर, 
विरहीणी के बहे झर-झर नीर!
यौवन का नशा बोले सिर चढ, 
वैतरिणी सी समाई रति मदन-उर!

आम्रमंजरी देख कुहूं कुहूं बोले, कोयल कारी! 
सुन मीठी बोली, पक्षिणी सुनाए पिल्लों को लोरी!
क्षितिज पर उभरी रच्चणहारे की सतरंगी रंगोली!
सूरज ने ओढी सितारों से सजी रजाई मखमली!
चांद झांकने लगा निशा के आंचल से बारी-बारी,
घूंघट की ओट से बोली निशा, प्रीत की रीत है भारी!

बसंत पंचमी उल्हास, उमंग, कला, ज्ञान उत्सव मनोहारी!
ज्ञान की देवी, कला-कौशल जननी, हंस आरोहिणी!
संस्कार, संस्कृति, सभ्यता का आगाज़ करती पाणिनी!
रिद्धि-सिद्धि दायिनी मां सरस्वती, धवल वस्त्र धारिणी!
नमोस्तु मां शारदे! विद्या, विवेक, विनय दायिनी!
ऋतुराज बसंत करे आराधना, पूजा, अर्चना, वीणा वादिनी!

द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई !




इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।