मिटटी से बने हाथी, गौरयाँ, हिरन ....
मिटटी के लटकते केले, अंगूर, जामुन ....
मिटटी का था चूल्हा, मिटटी के बर्तन …
गोबर से लीपा, बचपन का भीगा आँगन ....
मिट्टी के गुड्डा-गुड्डी, द्वार पर मिट्टी का चेतक ...
घास-पूंस की झोपड़ी, देहरी पे मिट्टी का दीपक…
आँगन में पेड़-पौधे फूल-पत्ते, मिटटी के ढेले ...
मिट्टी में पले-बढे, खेले-कूदे, मिट्टी के पुतले!
गुड्डे-गुड्डी की शादी में, सजे-धजे थे बाराती
झालर वाली फ्रॉक और सूट था विलायती !
दावत में थे मूंगफली-गुड से बने लड्डू, इमरती ...
स्वागत में खड़े थे पिंकी, चिंकी और मोती!
फूल चुन-चुन बनाई थी जयमाला, पिरोये मोती...
दूल्हे-दुल्हन के बिच अंतरपट, दादाजी की धोती !
तोतले भैरु ने पढ़े मन्त्र, युगल ने लिए तुलसी के फेरे.
'शुभ मंगल..सावधान', पिंकी-चिंकी ने अक्षत उछाले..
गुड्डा-गुड्डी की शादी में पिंकी, चिंकी, मिंटू दीवाना,
शब्दो से परे था बचपन का खुशियों का खजाना!
मासूम बचपन का यह...छोटासा है फ़साना...
बड़ों की बेरहम दुनिया से दूर स्फटिक सा नजराना !
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा