प्यार से... प्यार से हमको कभी बुलाया भी करो,
नफरत के धधकते शोले बुझाया करो!
बेरहम ज़िन्दगी से आँखें मिलाया करो,
मंजिल पर आँखें गढ़ायां भी करो!

धड़कते दिल का स्पंदन छुपाया न करो,
बुझी सी राख में चिंगारी सुलगाया न करो!
वक़्त-बेवक़्त ज़िन्दगी से यूँ उलझा न करो,
छोटी सी ज़िन्दगी शिकवों में जाया न करो!

इश्क़ में दीवानगी की हदें पार न करो,
उड़ते परिंदे के पर गिनने का प्रयास न करो,
प्रीत की गहराई नापाने की आस न धरो,
ईर्ष्या की आग में स्व को झोंका न करो!

इश्क़-प्यार का दूजा नाम त्याग-समर्पण!
ज़िन्दगी की पहचान 'तेरा तुझको अर्पण!'
चुनौतियों से नज़रें मिलाने का ले लो प्रण,
हे मनुज! खुद को दिखाया करो रे दर्पण।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|

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