भाग ३१
विभा, वैदेही और वज्र गुलमोहर तले यश का इंतज़ार कर रहें थे। सर्द हवाओं के बीच सूरज के पदार्पण से सभी उल्हासित थे। सूरज की सुनहरी किरणे चेहरे पर नूर बिखेर रही थी। तभी यश को देख विभा बोल पड़ी, " शैतान का नाम लिया और शैतान हाजिर!" यश के मुख से फूल बरस रहें थे। " हे श्वेत-वस्त्रधारिणी माँ! ज्ञान की देवी! आज कौनसे शुभ महूर्त पर आप सब मेरे गरीबखाने में पधार कर मुझे उपकृत करेंगे? हे ज्ञान की देवी! क्या आपको श्वेत कमल पसंद है?" सभी हँसने लगे!
वैदेही ने मानों उत्तर तैयार ही रक्खा था, " वत्स! माँ की कृपा आप पर बरस रही हैं! तीन बजे के शुभ महूर्त पर माँ तथा उनके भक्त आपके गर्भगृह में प्रवेश करेंगे..वत्स! तुम्हें उनके चरण प्रक्षालन का सौभाग्य प्राप्त होगा! सावधान! "
इस बार वैदेही ने ऐसे हाव-भाव कर संवाद बोला कि सभी अपनी हँसी रोक नहीं पाएं। एक-दूसरे से गले मिल सभी अपने घर की ऒर निकल पड़े! आखिर समय-प्रबंधन करना आसान काम थोड़े ही है? आज नुक्कड़ नाटक के अंतिम भाग का मंचन था! वज्र की प्रस्तुति अति-महत्वपूर्ण थी। खास बात यह थी कि आज बंदरिया को छोड़ कर सभी पात्र मंच पर एक साथ नज़र आने वाले थे।
भोजन के बाद कुछ सुस्ता कर यश तैयारी में लग गया। बंसी काका ने आज ऑनलाइन अमूल की रबड़ी के पैक और गरमागरम समोसों का आर्डर दिया था! कुछ फ्रूट्स और लक्ष्मीनारायण चिवडा भी यश ने लाने के लिए कहा था! वह जानता था... इन चटोरों का कुछ भरोसा नहीं... कब क्या खुराफ़त याद आएगी और फेहरिश्त लम्बी हो जाएगी...
समय की इज्जत तो सभी करना जानते थे! यश ने कुछ समय पहले ही दरवाजा खोल कर रख दिया था ताकि बार-बार गायत्री मन्त्र की अवमानना न हो!
हमेशा की तरह पहली एंट्री विभा की थी.. धमाकेदार! "पधारिये... मलिका-ए -हुस्न! आपका इस गरीब खाने में स्वागत हैं " विभा कहाँ खामोश रहने वालों में से थी? वह भी बोल पड़ी, " शहजादे! क्या मलिका-ए -हुस्न की शान में बादशाही पकवान तैयार हैं? "
दोनों दिल खोलकर हँस रहें थे कि वज्र और वैदेही भी पहुँच गएँ! यश और विभा ने शाही लहजे में कहा, " दरबार-ए-अजीज, शाही मेहमान का तहेदिल से स्वागत हैं! शाही खानसमा आपकी खिदमत में अभी हाजिर होंगे... पधारिये हुजूर! "
आज विभा बिल्कुल वक़्त जाया करना नहीं चाहती थी.. समय हिरन की चपलता से भाग रहा था। पहले पेट-पूजा सम्पन्न हुई और फिर नुक्कड़-नाटक का मंचन!
अब वैदेही मालकिन के रूप में सोफा पर विराजमान हुई और पास में स्टाइलिश ऐनक लगा कर वज्र मोबाइल में कुछ देख कर मुस्कुराने लगा.. विभा शकु बन कर यश यानि की मदारी के साथ आकार नीचे बिछे कालीन पर बैठ चुकी थी। फटे-पुराने कपडे, मिट्टी से सने बाल, हाथ में लाठी देख मालकिन वैदेही ने एक बार तो नाक-भौ सिकौड़े लेकिन दूसरे ही पल डॉक्टर साहब का इशारा समझ कर वह खामोश हो गई। उसने हौले से उठ कर कोमल स्वर में शकु और मन्या को डॉक्टर साहब का परिचय दिया और शकु को अपनी समस्या बताने के लिए कहा। शकु कुछ बोलती उसके पहले ही मन्या बोलने लगा, " साहेब! मला अमर व्हायचयं बर का! शकु म्हणते, तुमच्या कड़े लई बेस उपाय हाय म्हणे..साहेब! पैका न्हाय माझ्या कड़े.."
डॉक्टर वज्र पाटकर मुस्कुराने लगे। "अरे मन्या! तू ढोंगी बाबा के पास जायेगा तो वो पैसा ही मांगेंगे न... इस दुनिया मैं जन्म-मरण निश्चित हैं लेकिन अपनी बुद्धि का उपयोग कर तुम अमर हो सकते हो..."
अब शकु बोल पड़ी, "डॉ. साहब! जल्दी बताइये ! ये मन्या काम-धंदा छोड़ यहीं सोचते बैठता हैं...पता नहीं किस पिशाचनी ने घेरा हैं इसे! ओझा, बाबा, तांत्रिक सभी इलाज के नाम पर घूम फिर के पैसे पर आते हैं...कई दिनों से काम भी बंद और सब भूखे मरेंगे इस मन्या के अमर होने के चक्कर में... देवा! परमेश्वरा! वाचव रे मला.."
उसकी आँखों में नमी देख डॉक्टर साहब का भी दिल पसीज गया!
वह बोल पड़े," मन्या! अमर होना हैं न तुम्हें?
"हाँ...हाँ माई- बाप! अमर होना हैं।"
ड्रॉक्टर वज्र बोल पड़े, 'हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा' मानोंगे मेरी बात?
शकु और मन्या दोनों एक साथ बोल पड़े, " हाँ..हाँ.. आप तो देवदूत हो साब हमारे लिए ... आपकी बात क्यों नहीं मानेंगे?
ठीक हैं! अब जो मैं पूछता हूं, उसका जबाब देना हैं तुम्हें! डॉक्टर वज्र पाटकर ने मुस्कुरातें हुए कहा और वह उनके और करीब आएं।
चलों! शुरू करते हैं...
पहला सवाल: " किसी ने तुम्हें कहा.. इस गड्डे में कूद जाओ ...तुम्हें खजाना मिलेगा...तुम क्या करोगे?
दोनों एक साथ बोल पड़े, "हम मूर्ख थोड़े ही हैं, उसने बोला और हम गड्डे में कूद जाएंगे क्या? क्या साब...
डॉक्टर साब हँस कर बोल पड़े, " सही जबाब! यहाँ तुमने खुद विचार किया! किसी के कहने पर गड्डे में नहीं कूदे... सही हैं न! 'हाँ साहब... अगदी बरोबर' मन्या बुदबुदाया।
दूसरा सवाल: " शकु! तुम बैंगन काट रही हो सब्जी बनाने के लिए और बैंगन का ऊपरी भाग ख़राब निकला तो तुम क्या करोगी?
शकु फट से बोल पड़ी,' क्या साब! ख़राब भाग निकाल कर फेंक देंगे.. मन्या भी बीच में बोल पड़ा, "साब! ये भी क्या पूछने की बात हुई... और पूरा बैंगन ख़राब होगा तो? पूरा का पूरा फेंक देंगे साब !
"कौन कहता हैं तुम अनपढ़ हो! बिल्कुल सही जबाब दिया! " डॉक्टर ने उन्हें प्रोत्साहित करते हुएँ कहा और अगला प्रश्न दागा...
तीसरा सवाल : शकु! मन्या का सदरा फटा हैं और तुम्हारे पास नया सदरा खरीदने के पैसे नहीं हैं तो तुम क्या करोगी ?
क्या साब! मज़ाक कर रहें हैं जी! कहाँ से लाएंगे हम गरीब नया सदरा? उसी को ठीक करेंगे और क्या ?
डॉक्टर साब ने फिर पूछ, " अगर सदरा इतना फटा हैं कि ठीक होने जैसा न हो तो? अरे साब! एकदम सोप हाय की... फटे हुए उतने भाग को काट कर ठिगल लगाएंगे साब जी!
डॉक्टर वज्र पाटकर जी ने उनका अभिनन्दन किया और एक सौ रुपए की नोट उनके हाथ में रख दी! दोनों की आँखें चमक उठी!
अब समझें तुम दोनों! कितने होशियार हो! सभी सवालों के सही उत्तर दिँ तुमने!
अब चौथा और अंतिम सवाल? डॉक्टर वज्र बोल पड़े,
"जब तुम्हारी मृत्यु होगी तो लोग क्या करेंगे?
शकु फट से बोल पडी, "क्या साब! यहीं तो मन्या की चिंता है! झोपड़ी में अंदर-बाहर दस मिनिट का रोना-धोना फिर चिता पर सुलाने की चिंता!"
बहुत समय बीत चूका था इसलिए मालकिन ने सब के लिए चाय-पानी की व्यवस्था की। भूखे पेट ज्ञान की बातें हजम कहाँ होती हैं? साथ में दो प्लेट में बिस्किट्स भी मंगवाएं।
चाय-पानी होने के बाद फिर डॉक्टर साहब समझाने लगे.. "मन्या! चिता पर रखने के बाद तो मुर्दे की सिर्फ राख ही बचेगी न .. ज्यादा से ज्यादा अमीर व्यक्ति होगा तो गंगा में बहायेगा। सही हैं न!"
अब आते हैं मुद्दे पर! जैसे आप लोग छोटी-छोटी चीजों का समझदारी से उपयोग करते हो, क्यों न तुम्हारे शरीर का भी उपयोग वैसे ही समझदारी से किया जाय? मरने के बाद जल कर राख होने के बजाय तुम्हारी आँखें किसी अंध व्यक्ति के काम आ जाये तो वो अपने बाल-बच्चों को जी भर कर देख पायेगा, प्रकृति के अजूबों का आनन्द ले पायेगा, कितना खुश होगा न वह? क्या मरने के बाद उस व्यक्ति की आँखें अमर नहीं होगी?
"अरे वा साब! यह तो मैंने सोचा ही नहीं!" मन्या बोल पड़ा!
"और सुनो मन्या! ये जो तुम्हारा शरीर हैं न... उसके कई अंग दूसरे के काम आ सकते हैं, तुम्हारे जिन्दा रहते हुएँ भी और 'ब्रेन डेड' होने के बाद भी... जैसे तुम 'ठिगळ' लगाते हो न वैसे ही दूसरे व्यक्ति को ख़राब अंग निकाल कर, अच्छा अवयव लगा कर... अब सोचो! एक व्यक्ति के कितने अंग, ऊतक दूसरे को हम दान कर सकते हैं, उसे नई ज़िन्दगी दे सकते हैं, पता हैं.. पचास के लगभग...अब सोचो.. पचास लोगों को नई ज़िन्दगी देने वाला, उनकी ज़िन्दगी बेहतर बनानेवाला अमर तो होगा ही न? कितने लोगों के आशीर्वाद, दुआएं मिलेगी उसे!
"वाह साब! यह तो बहुत अच्छी बात हैं! साब क्या करना होगा मुझे?"
कुछ नहीं.. बस! यह नेत्रदान, अंगदान का फॉर्म भर कर देना होगा... मैडम जी बताएगी तुम्हें... फिर तुम्हें एक अंगदान दाता का कार्ड मिलेगा! सभी नजदीकी रिश्तेदारों को बोलना क्या! अब मैडम जी को तो पता ही हैं... पाँचवी तक तो पढ़े हो न?
तभी शकु बोल पड़ी, " साब! मन्या तो सातवीं तक पढ़ा हैं और मैं पांचवी तक! आगे स्कूल ही नहीं था न हमारे गाँव में!
"मैडम जी! लई उपकार होतील तुमचे!" आप करोगे न हमारा यह काम? ये फॉर्म भरने में मदद?
"शकु! पगली! डॉक्टर साब ने व्यस्त होने के बावजूद तुम्हें इतना समय दिया तो मैं क्यों नहीं दूंगी तुम्हें इतना सा सहयोग? अरे दीवानों! गिलहरी के योगदान से ही तो रामसेतु बनता हैं न! सही समय पर सही लोगों को तुम्हारे मृत्यु की जानकारी देनी जरुरी है तथा रिश्तेदारों का सहयोग! एक पुण्य काम के लिए इतना योगदान तो देंगे न वो? "
शकु और मन्या बहुत खुश थे। डॉक्टर साहब ने उन्हें अँधेरी गलियों से बाहर निकाल कर सही रास्ता दिखाया था जहां सारी मानव जाती को सूर्य की रोशनी बिना भेदभाव के मिल रही थी...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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