भाग १७
वैदेही, वज्र और यश को 'न्यू नार्मल' की तरफ लौटने में एक सप्ताह का समय लग गया था! वज्र को कोई असुविधा न हो इसलिए एक बड़ी सी खिड़की के पास उसके बैठने की व्यवस्था की गई थी.. उसे अलग से आरामदायक टेबल-कुर्सी दी गई थी! आबा इसीलिए आश्वस्त थे कि वैदेही हमेशा उसके पास के बेंच पर ही बैठती थी... वैदेही की समझदारी पर उन्हें पूरा विश्वास था! पढ़ाई के साथ-साथ अब वार्षिक उत्सव की तैयारियाँ भी शुरु हो गई थी! कॉलेज का माहौल सतरंगी इंद्रधनुष सा था... मानों फलक पर कला-कौशल के अद्भुत मेले की तैयारियाँ चल रही हो!
उनके महाविद्यालय का पूरे महाराष्ट्र में नाम था! अन्तरमहाविद्यालयीन प्रतियोगिता हो या उनके कॉलेज की स्पर्धा, सभी बढ़-चढ़ कर उसमें हिस्सा लेते थे! मुम्बई का यह पुराना, प्रख्यात महाविद्यालय अरसों से कला- रसिकों के दिल में अपनी अक्षय जगह बना चूका था! कक्षा में तथा नोटिस बोर्ड पर वार्षिक उत्सव के प्रस्तावित कार्यक्रमों की सूचना देख कर वैदेही फूली नहीं समाई! यश का आने का इंतज़ार करते-करते दोनों कॉलेज के मुख्य प्रवेश कक्ष में लगे मुलायम, गद्देदार सोफे पर बैठ गएँ! वज्र अपने लैपटॉप पर वैदेही को कुछ दिखा रहा था तभी पीछे से एक कोयल सी मीठी आवाज़ सुनाई दी... " हाय हैंडसम! पहचाना मुझे? जवाब की प्रतीक्षा किए बिना ही वह आगे की तरफ चली आई और वज्र के सामने खड़ी हो गई ..
कुछ पल के लिए वज्र और वैदेही स्तब्ध हो गएँ... अगले ही पल दोनों एक साथ बोल पड़े.. "ओ माय गॉड! यूँ...नॉटी गर्ल! विभा! व्हाट अ प्लेझंट सरप्राइज! " तभी यश भी पहुँच गया!" हे! टॉम बॉय..
नो..नो.. नो...माय नॉटी गर्ल... अब भी शैतानी नहीं गई तेरी! विभा! पूरा 'मेक-ओवर' हो गया यार तेरा...भला हो ऊपरवाले का.. तेरी आवाज़ नहीं बदली... वरना... और सब हँसने लगे मानों कई दिनों के सूखे के बाद कुछ बुँदे बरसी हो तपती धरा पर!
दोनों सामने के सोफे पर बैठ गएँ! वैदेही, विभा के आँखों से पानीदार मोती बरस रहें थे और यश और वज्र उन्हें देख कर मुस्कुरा रहें थे! वज्र कुछ सोच रहा था तभी यश बोल पड़ा, " मेरी झाँसी की रानी! एक कॉल कर देती....
तभी वज्र बोल पड़ा, " यार! हम तुम्हें रिसीव करने आते " दोनों की बातें सुन विभा कहकहें लगाने लगी.. यार! बच्ची हूँ मैं? तुम्हें सरप्राइज कैसे देती? यार! समझा करों न.."
सब उठ खड़े हुए.. एक-दूसरे के पीठ पर हाथ रख कर सब साथ में चिल्लाएँ.. "थ्री चियर्स फॉर विभा! हिप हिप हुर्रये...."
लम्बे समय के कुहांसे के बाद यह नीला आकाश, रुई के फाहे से सफ़ेद बादलों को देख सब के सब उल्हासित हो गएँ थे!
"यश! चलों.. मैं तुम्हें ड्राप करती हूँ और वैदेही तुम..
वज्र के साथ जाओगी न?" विभा बोल पड़ी! बहुत दिनों बाद उसे टीम का नेतृत्व सँभालते देख वैदेही मन-ही-मन आनंदित हुई..
"बाय..बाय! कल मिलते हैं.. यहीं.."कह कर सभी निकल पड़े अपने-अपने आशियाने की ऒर...सागर में अचानक आएं उफान के बाद लहरें कुछ शिथिल हो गई थी... वज्र ने वैदेही से पानी की बोतल मांगी... वैदेही सचेत हो गई... उसने झट से पानी की बोतल खोल कर वज्र को दी... कुछ पल की खामोशी के बाद वज्र ने कहा," वैदेही! आज कुछ अटपटा सा लग रहा है..उसने वैदेही का हाथ हौले से दबा कर कहा, " घरी चल न... प्लीज"
"आई वाट पाहत असेल माझी.. जेवयाला थांबली असेल माझ्या साठी ..." वज्र तुम और आबा भोजन के बाद थोड़ा आराम करना.. मैं आती हूँ शाम को तुम्हारे यहाँ..."
वज्र खामोश हो गया... "नक्की येशील न?" वज्र ने वैदेही के "हाँ" कहने पर ही उसका हाथ छोड़ा!
कभी-कभी वज्र एकदम छोटे बच्चे सा ज़िद करता था..उसकी ज़िद भी वैदेही को अच्छी लगती थी... उसकी इसी मासूमियत की कायल थी वह! इतना स्फटिक सा शुद्ध, निर्मल दिल था वज्र का कि दिल की झील में झाँकों तो वैदेही का प्रतिबिम्ब उसे जरूर नज़र आएगा..
ड्राइवर के ब्रेक मारते ही वह संभल गई... वज्र को बाय-बाय कर उसने फिर एक बार शाम को आने का वादा किया और वह फाटक खोल कर घर के अंदर चली आई..
एक बार तो वैदेही के मन में विचार आया कि वह आबा को सूचीत कर दे कि वज्र आज कुछ थका-थका सा महसूस कर रहा है लेकिन दूसरे ही पल उसने सोचा... कहीं सुन कर आबा का ब्लड प्रेशर बढ़ गया तो..
उसने झट से हाथ-मुँह धोएँ, माँ के साथ बातें करते-करते भोजन किया और अपने कमरे की ऒर जाने लगी... तभी फ़ोन की घंटी बजी..
आबा थे फ़ोन पर... 'वैदेही! बाळा! आई बरोबर यें न पोरी आज! संध्याकाळी इथेचं या ग दोघी जेवायला... काय सांगू तुला.. आज वज्र ऐकायलाच तैयार नाही... बाळा! आई ला दे न जरा फ़ोन! बात करते-करते माँ के चेहरे पर तनाव की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थी...वह आबा को हिम्मत दे रही थी.." आबा! येतो आम्ही दोघी! काळजी करु नका..आम्ही चहा तुमच्याच घरी पिणार बरं का आबा... "
वैदेही ने खुद को लताड़ा.. मुझे पहले ही बता देना था न आबा को... वज्र को कुछ हो जाता तो...
आशंका के बादलों ने वैदेही के मन-आँगन में तूफान मचा दिया था... दोनों माँ-बेटी ने फटाफट काम ख़त्म किया और चल पड़ी दोनों वज्र को मिलने...
माँ का तो किसी भी बात में मन ही नहीं लग रहा था... वज्र की चिंता उसे खाएँ जा रही थी....एकलौता बेटा... क्या कुछ नहीं कर रहे थे आबा उसके लिए... वह अधीर हो रही थी... "आई! इतना टेंशन क्यों ले रही हो? अरे! आज विभा को अचानक देखा तो थोड़ा उत्तेजित हो गया था.. हमसे बातें करेगा तो थोड़ा शांत हो जायेगा... " लेकिन जानकी कहाँ मानती! वह पांडुरंग के सामने जा कर उसकी विनती करने लगी... "देवा! माझे आयुष्य दे रे वज्र ला.."
वैदेही तनाव का सही तरीके से व्यवस्थापन कर उसे कम करना जानती थी... उसने माँ के कन्धे पर हाथ रक्खा, तैयार होने को कहा और खुद भी कपडे बदलने चली गई...
हादसे ने सभी के दिलों को कमजोर, नाजुक बना दिया था... वक़्त की सुनामी को हँस कर झेलने वाले आज वक्त की बेरुखी देख जरासी ऊँची लहर को आते देख कर ही डर जाते थे..
स्वाभाविक भी था यह बदलाव! आखिर उनकी सहनशीलता की भी कोई हद तो थी ही न...आबा उनको देख बच्चों से फाटक तक दौड़े चले आएं... आज वैदेही को महसूस हो रहा था... बाप-बेटे दोनों को मानसिक सहारे की सख़्त जरुरत हैं ... वैदेही ने आबा को प्रणाम किया और बोली, " आबा! आज विभा आली होती कॉलेज ला..." आबा! उस से मिल कर वज्र थोड़ा उत्तेजित हो गया था ... बाकि अभी ठीक हो जायेगा उसका मूड! आज अन्नपूर्णा को बोलो आबा... पाव-भाजी बनाने को... देखो! कैसे खुश होता है वो...
न जाने क्यों... दोनों माँ-बेटी को देख कर दोनों बाप-बेटे को हिम्मत आ जाती थी... पता नहीं किस जनम का बंध था उनका... उनकी उपस्थिति ही उनमें ऊर्जा भर देती थी! दोनों परिवार एक-दूसरे के पर्याय बन चुके थे, एक-दूसरे का आधार थे वह ... शायद इसीलिए कहते है, 'डूबते को तिनके का सहारा'....वक़्त ने कई बार, कई मौकों पर उनकी परीक्षा ली थी और वो हर बार वक़्त की कसौटी पर खरे उतरे थे..
स्वार्थ की नींव पर खड़े रिश्ते कमजोर होते हैं, वक़्त की आँधी में वो जड़ों से उखड़ जाते हैं लेकिन त्याग, समर्पण और आपसी विश्वास पर खड़े रिश्ते जनम-जनम का साथ निभाते हैं.. वक़्त तो ठेंगा दिखा-दिखा कर उसे अक्सर चिढ़ाते हैं...दोनों परिवार एक-दूसरे के लिए समर्पित थे और उस दुर्घटना के बाद उनका यह परिवार भी बढ़ चूका था मानों एक टीम की तरह वह वक्त की चुनौतियों का डट कर सामना करने के लिए प्रतिबद्ध थे...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|
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