ख्वाबों की महफिल
ख्वाबों की महफिल है जीने का रास्ता 
चलते है ये भी आहिस्ता-आहिस्ता 

कभी भोर में कभी रात में 
कभी-कभी बिन मौसम बरसात में 
हो जाते है गुमसुम जब अपनी ही बात में 
छोड़ देते हैं सबको डूब जाते है ख्वाब में 
हर किसी का पड़ता है इनसे ही वास्ता 
ख़्वाबों की महफिल है जीने का रास्ता.....

डूबे हैं सब इसमें चाहत है हकीकत की 
ख़्वाबों के दर पर कीमत है सबकी 
छीन लेता है य़ह हमसे हमारी जवानी 
रह जाती है हमारी अधूरी कहानी 
वक़्त भी फिसलता है आहिस्ता-आहिस्ता 
ख़्वाबों की महफिल है जीने का रास्ता.....


द्वारा Kapil Tiwari
Shared07 Sep 2025
Start 07 Sep 2025
End 07 Sep 2030
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