भाग ८०
अप्पा ने डॉक्टर से बात की और कल की अपॉइंटमेंट जो पहले से ही निश्चित थी उसे फिर एक बार मंजूरी दे दी। विभा कॉलेज जा चुकी थी। अप्पा और लाली ही घर में थे। लाली डर-डर कर काम कर रही थी। कभी उसके हाथ से तपेला गिर जाता तो कभी चम्मच! अप्पा पानी का लोटा भी भर कर मंगाते तो उसके हाथ थरथराने लगते। अप्पा उसकी हर गतिविधि को ध्यान से देख रहे थे।
अप्पा विभा का इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने लाली को आवाज़ लगाई। लाली रसोई से बाहर आकार अप्पा के सामने खड़ी हो गई। अप्पा ने उसे पूछा, " आज खाना क्या बनाया हैं? उसने थरथराते होठों से नाम दोहराने की कोशिश की लेकिन उसके मुँह से आवाज़ ही निकलनी बन्द हो गई थी। अप्पा ने उसे बैठने के लिए कहा। वह सिमट कर छुईमुई सी हो कर एक कोने में बैठ गई।
अप्पा ने दो मिनट उसे निहारा और कहा, " उद्या डॉक्टर ऑन्टी कड़े जायच आहे। थोड़ा सा त्रास होईल तुला.. पण इलाज नाही! सहन कराव लागेल तुला। आईला बोलवू का?, " अब लाली अप्पा के पैर पकड़ कर रोने लगी! अप्पा! तुम्ही मला जोड़याने मारा पण आई ला नका सांगू! चुकलं माझ!"
अप्पा श्रीफल से कठोर जरूर थे लेकिन उनके ह्रदय के अंदर भी प्यार के मीठे पानी का झरना बहता था। उन्होंने लाली को कहा कि अगर वह सब कुछ सच-सच बता देगी तो उसे न्याय दिलाने के लिए अप्पा कोशिश करेंगे और बात को उसकी आई को नहीं बताएँगे। उन्होंने उसे यह भी समझाया कि सब उन्हें मालूम ही हैं लेकिन वह उसके मुँह से सुनना चाहते हैं। अप्पा ने उसे पानी पीकर आने को कहा। कल जो भी खाना हैं सुबह सात बजे तक खाना हैं। बाद में रात तक उसे कुछ भी खाने की इजाजत नहीं हैं यह भी समझा दिया था अप्पा ने उसे ।
लाली ने अप्पा के सामने सब कुछ उंडेल दिया था। अप्पा अब विभा का इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने लाली को खाना खा कर आराम करने को कहा। एक तरफ इस बच्ची के लिए उनका मन द्रवित हो रहा था तो दूसरी तरफ उन्हें उस निर्दयी दरिंदे पर गुस्सा आ रहा था।
दोपहर का एक बज चूका था। अप्पा विभा को फ़ोन करने ही वाले थे कि विभा ने घर में प्रवेश किया। लाली रो-रो कर थक गई थी। विभा उसे बुलाने जाने ही वाली थी कि अप्पा ने उसे न जगाने की विभा को हिदायत दी और कहा कि उनकी लाली से बात हो चुकी हैं। उसे कुछ समय तक आराम करने दे। हम खुद खाना परोस कर ले लेंगे।
दोनों बाप-बेटी भोजन करने बैठे। विभा ने हॉस्पिटल के लिए आएं पैसे का लेखा-जोखा उनके सामने रक्खा और हॉस्पिटल के अकाउंट के लिए 'नेट बैंकिंग' की सुविधा लेने की सलाह दी ताकि खाते से जावक पर उनका नियंत्रण रहें। ज्यादातर सभी दानदाताओं ने अपनी बोली की रकम दे दी थी। एक-दो जो बाकी थे उन्हें भी खाते की जानकारी भेज दी गई थी। अप्पा ने सभी दानदाताओं को धन्वन्तरी जी की चाँदी की प्रतिमा भेंट स्वरुप दी थी ताकि सदैव इस शुभकार्य की स्मृति उनके मानस पटल पर अंकित रहें!
अप्पा ने सोचा उससे भी तेज गति से अस्पताल का काम चल रहा था। उन्होंने विभा से सलाह-मशवरा किया और कल डॉक्टर के यहाँ जानकी जी को साथ ले जाने का निश्चित हुआ। अप्पा को भी उसी ऒर आना था हॉस्पिटल के काम से... दोपहर को.. तो उन्होंने भी काम ख़त्म होने के बाद वहाँ पहुँचने की बात कहीं।
चाय का वक़्त हुआ तब तक लाली उठ कर आ चुकी थी। उसने सब के लिए चाय बनाई और अप्पा ने जानकी जी को फ़ोन किया। पहले तो उन्होंने जानकी जी का आभार व्यक्त किया और कल जाने के बारे में पूछा। जानकी जी ने तुरंत हामी भर दी। यश और वज्र से भी उन्होंने बात की और अगर जरुरत पड़ी तो उन्हें बुलाने की बात कह दी।
विभा चाय पीते-पीते अप्पा से खुल कर बतियाने लगी! "अप्पा! त्या राक्षसा ला असचं सोडून ध्यायचं? अप्पा ने विभा को कहा, " अब तुम इस बारे में सोचना बन्द कर दो! तुम सिर्फ लाली को सम्भालो! बाकी मैं संभाल लूंगा! विभा! बेटा कभी-कभी कुछ काम भावुकता से नहीं दिमाग़ से तथा चलाखी से करने पड़ते हैं... 'साँप भी मरे और रस्सी भी न टूटे'...अब तुम सब मुझ पर छोड़ दो। तुम सिर्फ अपना और लाली का ध्यान रक्खो! ऐसी गलती दुबारा नहीं होनी चाहिए!
अप्पा ने दोनों को ही कड़क आवाज में इशारा दे दिया था। उन्होंने कभी ज़िन्दगी में बच्चों पर हाथ नहीं उठाया था, उनकी टेढ़ी भृकुटी ही काफी थी बच्चों को समझाईश के लिए! उनका अनुशासन ही इतना कड़क था कि कोई उन दायरों को तोड़ कभी कुछ करने की हिम्मत ही नहीं कर पाता। गाँव में उनका दबदबा था।
लाली को यहाँ खुला आसमान मिल गया था। जब भी विभा बाहर जाती, वह आसमान में लहराती पतंग सी ऊँची उड़ने की कोशिश करती! घर में न दीदी का डर न माँ की डांट का खौफ़ ! हवा के साथ-साथ बहना उसके लिए आसान हो गया था। जब भी विभा घर में होती, वह लाली का ध्यान रखती लेकिन उसे क्या मालूम कि लाली किसी अजनबी की चिकनी-चुपडी बातों में आ कर, बिना सोचे-समझें ख़्वाबों के महल सजा कर, संस्कारों को दफ़न कर, अप्पा तथा माँ के विश्वास को तिलांजलि दे किसी और की बातों में इतनी गुम हो जाएगी कि उसे अपनी विधवा माँ का भी खयाल नहीं रहेगा!
पतंग को ऊँचा उठाने के लिए बेशक़ खुला आसमान चाहिए लेकिन जब तक वह माँझे के रूप में अपनों से जुड़ा हैं तब तक तो उसके भटकने की कोई चिंता नहीं लेकिन जब पतंग का मांझा ही टूट जाये तो पतंग यहाँ-वहाँ भटक कर कहीं कांटों में अटक जाएं तो आश्चर्य कैसा?
अप्पा राजनीति के दलदल में यूँही नहीं टिके थे इतने साल। जहाँ नीति वहाँ नीति और जहाँ कूटनीति वहाँ कूटनीति का उपयोग करना वह बखूबी जानते थे। राजनीति के दलदल में वो पंकज से खुद को अलिप्त रखते थे जरूर लेकिन कोई उनपर चढने की कोशिश करता तो वह उसे पटखनी दिए बिना नहीं रहते। उन्हें पता था शराफत सिर्फ शरीफों से की जाती हैं, दरिंदों से नहीं!
'आली अंगावर तर घेतली शिंगावर' उनका यह गांवरान हीसका पूरे क्षेत्र में मशहूर था। अप्पा चुप इसलिए थे कि पहले उन्हें लाली का भविष्य बचाना था। उनकी एक गलती उसका जीवन अंधकारमय कर देती।
एक विधवा की बच्ची...भले ही गांव की उबड़-खाबड़ पगदंडी पर चल कर ही बड़ी हुई थी लेकिन किस-किस को जबाब देती, किस-किस से भीड़ती? किस-किस की प्रताड़ना सहती और किस-किस के मुँह पर हाथ रखती? अप्पा ने 'न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी' का रास्ता चुना! उन्हें 'न सौ मण तेल होगा, न राधा नाचेगी' यहीं नीति सही लग रही थी। वो राजनीति के कुशल खिलाडी थे। हुक्म का इक्का हाथ में रख कर ही खेलते थे....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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