आधि-व्याधि का चक्रव्यूह.... 1.
अंतरिक्ष की टोह लूँ मैं, चन्द्रमा पर ढूँढू ठौर,
बाज़ सी उड़ान भरुं मैं, हौसला हो सिरमौर!
2.
लक्ष्य मत्स्य-नेत्र सन्धान, एकाग्रता का भान,
काया-माया जंजाल में भटके न कहीं ध्यान!
3.
आधि-व्याधि के चक्रव्यूह में भूल न जाऊ कर्म,
सुन्दर, सुदृढ, सशक्त शरीर ही सफलता का मर्म!
4.
उचित पोषण-संयम, समतोल-सुरुचिकर भोजन, 
शुद्ध आचार-विचार, शरीर-सौष्ठव, उत्तम निदान!
5.
मनुज जन्म दुर्लभ, असंख्य रोग-कषाय से ग्रस्त,
रिश्ते-नाते, लोभ-क्षोभ के उलझे धागों से त्रस्त!
6.
कर्मयोगी बन जी लो जीवन, रहो वर्तमान में मस्त,
दीन-दुःखियों की सेवा-चाकरी में रहो सदा व्यस्त!
7.
चिंता, तनाव, अवसाद, नैराश्य से दूरी का यही मन्त्र,
धैर्य, सबूरी, अपरिग्रह, संयम, स्व-अनुशासन है तंत्र!
8. 
सादा-सरल जीवन, उच्च विचार, उन्नत ध्येय सदैव,
देव, गुरु, धर्म, माता-पिता समक्ष विनीत रहे सदैव!
9.
देशभक्ति रचि-बसी हो बहते रुधिर कण-कण में,
पैनी नज़र, सशक्त भुजाएँ, सबल युवा राष्ट्रहित में!
10.
हिमालय सी सोच, गंगा सी पावन, ऊर्जा दिनकर की
प्रकृति माँ के आँचल में पल्लवीत युवाशक्ति राष्ट्र की!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|


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