दो हंसों का जोड़ा....

"दो हंसों का जोड़ा, बिछड़ गयो रे,

गज़ब भयो रामा... गज़ब भयो रे!"

गाने के बोल सुन माँ को सांत्वना देने की बजाय मेरी आंखों से भी गंगा-जमुना बहने लगी। आधी सदी से ज्यादा का सफ़र साथ तय करने के बाद हमसफ़र साथ छोड़ चला गया था और माँ अकेली तन्हाइयों में रो रही थी! 

दो साल से पिताजी की अनवरत सेवा ही उसका जीवन था! एक अदृश्य डोर उन्हें बांधे हुए थी! मानो दोनों एक-दुजे के लिए ही बने थे! जरासी चोट पिताजी को लगती तो माँ कराह उठती! अपने बच्चों के सिवा किसी को पास फटकने भी नहीं देती थी माँ! अंत में तो पिताजी भी उसे आई कहने लग गए थे! एक शिशु की तरह संभाल रही थी माँ उन्हें!

आपसी तालमेल, त्याग, समर्पण तथा एक-दूजे पर अटूट विश्वास सफल दांपत्य जीवन की मजबूत नींव थी जिसे जीवन में आए तमाम जलजले, तूफान, धरणीकंप भी हिला नहीं पाए थे! 

बचपन के वो दिन याद हैं मुझे जब पिताजी भारत सरकार की शिष्यवृत्ति पाकर उच्च शिक्षा के लिए पश्चिम जर्मनी गए थे! एक समय ऐसा भी आया कि पिताजी की सात महीने तक कोई चिट्ठी नहीं आई! माँ से कोई कुछ और कोई कुछ कहता, पर माँ को खुद पर, अपने पति पर पूरा विश्वास था! फिर एक दिन नीला पत्र आया जिसमे लिखा था कि पिताजी की आंखों का ऑपरेशन हुआ था और उस वजह से वो चिठ्ठी नहीं लिख पाए थे! माँ की शक्ति थी उसका अटूट, अटल विश्वास! 

चौथी पास थी मेरी माँ लेकिन पिताजी उसे रोज अंग्रेजी सिखाते थे! जीवन की पाठशाला में इतना कुछ पढ़ लिया था कि शिक्षित-दीक्षित भी उसके सामने पानी भरें!

आँखों की भाषा जानते थे वो! चेहरा पढ़ लेते थे वो एक-दूसरे का! समय चक्र के झंझावातों में एक-दूजे का हाथ पकड़ चले कम मगर एक-दूजे का साथ अंत तक निभाया था उन्होंने!

पिताजी की बायपास सर्जरी थी, खुद का होनहार बेटा डॉक्टर था लेकिन ऑपरेशन थियेटर में पिताजी को ले जाने के बाद से भूखी-प्यासी खड़ी थी दरवाजे के बाहर! जरासी आहट होती कि दरवाजे की ओर दौड़ती! ऑपरेशन सफलतापूर्वक हुआ, पिताजी को सकुशल देखा तब जाकर उसने दो घूंट पानी पिया! उसकी जीवट, समर्पण को देख समझ में आ चुका था उनके सफल दांपत्य जीवन का राज! 

पिताजी जब भी मुड़ में होते कहते, जब भी एक गुस्से में होता है, दूसरा खामोश रहता है भले ही उसकी गलती न हो! जो कहना है, बाद में कहते है! आग लगी है, घी डालोगे तो क्या होगा! शायद यहीं था उनकी सफलतम दाम्पत्य जीवन की लंबी पारी का राज!

पिताजी अक्सर मज़ाक में कहते...’बीबी कैसी होनी चाहिए? पेपरवेट के जैसी! उड़ते पन्नों को थाम कर रखने में माहिर!

माँ मन से मजबूत लेकिन शरीर से कमजोर थी! बाहर का काम पिताजी देखते! परचून-सब्जी, दवाइयों से लेकर बच्चों की किताबों तक सब पिताजी ले आते! माँ घर का हर काम खुद करती! छ: बच्चों की परवरिश से लेकर पालन-पोषण तक मगर कभी बीमार हो जाती तो पिताजी उसकी सेवा-चाकरी से नहीं हिचकिचाते! कभी हमारे लिए 'मर्दानी पुलाव' बनाते तो कभी दाल बना कर टोस्टर में ब्रेड सेंक कर हम सबको खिलाते!

छोटी सी दुनिया थी उनकी!  न जमाने के बंधनों की ना बाकी दुनिया की पर्वा थी उन्हें! उस जमाने में मेरी माँ न तो घूंघट निकलती थी न अपने पति के साथ-साथ साँझ में घूमने निकलने में शर्माती थी!

उम्र के ढलान पर लड़ते-झगड़ते थे मगर मजाल है कि कोई दूसरा उनकी ओर उंगली उठाए! खुद्दारी की जीती-जागती तस्वीर थे वो! मानो 'दो जिस्म, एक जान'.... अचानक एक तारा टूट जाए तो ... माँ का यहीं हाल था! एक उदासी, खालीपन, अधूरापन उसे खाए जा रहा था! सफ़र का सारा जोश, उत्साह मानो हवा हो चुका था और वह खुद को ढोए जा रही थी...ढोए जा रही थी...कोल्हूं के बैल की तरह...अनमनी सी, थकी-थकी सी!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |

 

 

 

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