ये प्यार ही तो ज़िन्दगी...भाग ४
भाग ४

सारी रात कजरारे बादलों का कोहराम जारी था.. पल-पल चमकती बिजुरी और अगले ही पल गडगड़ाहट करते बादलों ने उसकी नींद को उचाट कर रख दिया था। भोर का वह इंतज़ार कर रही थी पर पता नहीं क्यों उन्होंने सूर्य देव को बंधक बना रक्खा था! रोशनी का अदना सा टुकड़ा भी नज़र नहीं आ रहा था। वैदेही पीड़ा से कराह रही थी... न जानें क्यों उसे अनहोनी की दस्तक रात से ही सुनाई दे रही थी! वह अस्वस्थ हो गई थी। दिल के तारों में से एक तार के टूटने का अंदेशा उसे हो गया था। 

तभी फ़ोन की रिग टोन बजने लगी .. माँ ने फ़ोन उठाया और सीधी बाहर चली गई... उसकी आँखों से अश्रुधारा बह रही थी...डॉक्टर्स से मन्त्रणा के बाद विनय को ग्लोबल हॉस्पिटल स्थानांतरित किया जा चूका था! वेंटीलेटर हटाने के कुछ ही घंटों बाद विनय सबको अलविदा कह कर चिरप्रयाण को निकल चूका था... एक परिंदा उड़ कर ब्रह्माण्ड में खो चूका था...
वह आँखें पोंछ कर अंदर लौटी ही थी कि वैदेही बोल पड़ी.. माँ! विनय चला गया न...मैं जानती हूं तुम मुझसे सच्चाई छुपाने की कोशिश कर रही हो। पर रात को ही मुझे संकेत मिल गया था माँ ....बहुत करीब था वह मेरे दिल के....मेरी धड़कनों से जुड़े थे उसके दिल के तार! 
वैदेही फिर खिड़की से बाहर देखने लगी..धूप ने कालिमा को पछाड़ दिया था और रोशनी का आगाज पूरे जोर-शोर से हो रहा था! लेकिन यह रोशनी ना तो सुकून दे रही थी न शान्ति! 
आज न वैदेही ने खाना खाया न माँ ने... अतीत की गहराइयों में डुबकी लगा कर यादों के पानीदार मोती ढूंढ रही थी वैदेही लेकिन हाथ कुछ भी नहीं लगा था। विनय उसका पहला प्यार था... वह कहते है न... पहली नज़र का प्यार....'Button Rose' के पौधे पर खिले अनगिनत गुलाब से बेशुमार उम्मीदों भरा प्यार! विनय का मुस्कुराता चेहरा, दिल-फेंक अदा, प्रकृति से असीमित प्यार और स्फटिक सा निर्मल, निस्वार्थ, निष्कलंक दिल...उसके साथ की गई पहली ही एकांकीका का मंचन उसके मन में प्यार की चिंगारी भड़का चूका था... यह प्यार था राधा सा.. मीरा सा... अलौकिक.. अनबुझी पहेली सा! लेकिन वह खामोश रही.. पानी से अक्षय भरी गगरी सी... अधजल गगरी सा लूर-लूर जाना उसका स्वभाव नहीं था! वह सरल, सपाट मैदानी अँचल में बहती गंगा मैया सी ... शांत, सहज़, समर्पित थी!
वार्ड में डॉक्टर की आवाज़ सुन माँ ने उसे जगाया! वह अनमनी सी उठने की कोशिश करने लगी तभी डॉक्टर मालिनी ने प्रवेश किया...
"कशी आहेस वैदेही? घरी जायचं न आज?" सभी रिपोर्ट्स नार्मल हैं... पेट और सिर के घाँव भी भर गए हैं! अब तुम घर जा सकती हो वैदेही ...भूलना मत! तीन दिन बाद फॉलो-अप के लिए आना है तुम्हें .. बाकि सब सिस्टर बताएगी तुम्हें... टेक केयर बेटा!
वैदेही ने हाथ जोड़ कर उनका धन्यवाद किया और वह  फिर खिड़की से बाहर देखने लगी... माँ डिसचार्ज की फ़ाइल लेने सिस्टर के पास चली गई...
पल भर के लिए वो निशब्द हो गई.. अगले ही पल विनय की बातों को याद कर वह कपडे समेटने में लग गई... आज मानों उसका पुनर्जन्म हुआ था..
तभी फ़ोन की घंटी बजने लगी... वह बोल पड़ी... "आबा! तुम्ही गप्प का? आई खाली गेली आहे...कैसा हैं वज्र? ऑपरेशन हो गया? ICU में हैं न..क्या होश आ गया उसे? " वह सवाल पर सवाल दागे जा रही थी और आबा की आवाज़ न जाने कहाँ खो गई थी... तभी माँ ने वैदेही के हाथ से फ़ोन लिया और वह बाहर जा कर बातें करने लगी!
वैदेही फिर निराश हो गई.. ये बड़े क्यों छुपाते हैं सच हमसे? छोटे बच्चे तो हैं नहीं हम कि हम उनकी बॉडी लैंग्वेज नहीं समझ पाएंगे...
वह समझ गई! शायद अभी तक होश नहीं आया हैं वज्र को! हार्ट ट्रांसप्लांट का ऑपरेशन..एक बहुत ही जोखिम भरा ऑपरेशन...पर दूसरा रास्ता ही नहीं बचा तो फिर...
वह आँखें मुंद कर वज्र के लिए प्रार्थना करने लगी। हे अनाथों के नाथ! अब तो दया कर दयानिधान! वज्र को वज्र सा मजबूत बना दे भगवान! शक्ति दे दाता... शक्ति दे!
माँ लौट चुकी थी... अस्पताल में बीते ये आठ-दस दिन उसे युगों-युगों से भारी महसूस हो रहें थे! सालों-साल हिम्मत से अकेली दुनिया को चुनौती देती माँ आज खुद को थोडा थका-थका सा महसूस कर रही थी! सभी का शुक्रिया अदा कर वह जाने की तैयारी में व्यस्त हो गई! आबा से कह कर उसने कामवाली मावशी से घर की सफाई करा ली थी! 
"वैदेही! बेटा! काही मागवू का खायला? " माँ बोल पड़ी!
"आई! पहले घर पहुंचते है! आँगन में तुलसी के सामने दीया जलाएंगे, देहरी पर मिट्टी का दीया रक्खेंगे.. फिर सोचेंगे.. तू फ़िक्र मत कर..मैं बिल्कुल ठीक हूं माँ!" वैदेही ने माँ के कन्धे पर हाथ रख कर कहा और वह बाथरूम की तरफ धीरे-धीरे चल पड़ी...
माँ भी शायद यहीं सोच रही थी! इतने दिनों में उसका सब के साथ एक रिश्ता सा बन गया था..आसपाल में आया हुआ हर कोई तकलीफ में ही यहाँ आया हुआ था मगर सभी एक-दूसरे को सहारा दे रहें थे, एक -दूसरे की यथा संभव मदद कर रहें थे ... माँ की पलकों पें आँसू ठहरे हुए थे मगर उसका विश्वास आज और पक्का हो गया था..उसे यकीन था...वक़्त ऊपरवाला देता हैं अपने-पराए की परीक्षा के लिए बाकी निकालता भी तो वहीं हैं..
तभी फ़ोन की घंटी बजी..आबा का कॉल आया था .. "पोरी! पाठवू का कोणाला..." नको.. नको...ओला बुक केली आहे.. सिस्टर, मावशी मदतीला आहेत ..."माँ बोल पड़ी! उसने आबा को पूछा,
"वज्र को होश आया? आबा की सिसकियाँ सुन कर वैदेही की माँ की भी आँखें नम हो गई.."पोरी! हो ग... देवा न माझं ऐकल बर का... साँज वेळ झाली.. मी दिवा लावायला सांगतो विघ्नहर्ता समोर..."
अब वैदेही घर पहुँच चुकी थी पर उसका मन विनय-वज्र के बिच छुपा-छुपी खेल रहा था..विनय अतीत की गर्त में समा चूका था पावन स्मृतियों के साथ, औरों को नई रोशनी दे कर और वज्र के जीवन के फड़फड़ाते दीये की लौ अब स्थिर हो चुकी थी स्नेह को पाकर... ये भी कैसा खेल था नियति का! एक दिया बुझ चूका था दूसरे दीये को रोशनी दे कर...जहाँ में उजाला तो था पर एक घर अँधेरे में डूबा हुआ और घर में नन्हा मिट्टी का दिया हवाओं से बचने की जद्दोज़हद में लगा हुआ था!


स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई 

शेष अगले भाग में...

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