ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.... भाग १०

भाग १०

फोन की रिंग टोन सुनते ही वैदेही दौड़ी चली आई! सुबह के दस बज चुके थे... स्क्रीन पर यश का नाम देखते ही उसने झट से फ़ोन उठाया।
"हेलो... कौन यश? तभी सामने से एक शरारती हँसी के साथ आवाज़ आई.. "क्या यार! आवाज़ भी नहीं पहचानती दोस्त की! चार दिन दूर क्या चला गया... भूल गई अपनी नाटक मण्डली के पात्र को!

"वैदेही फिर बोल पड़ी.." कहाँ है यार तूँ.. सिर्फ मज़ाक ही करता रहेगा या कुछ ठोस काम भी करेगा... दुनिया सयानी हुई.. तू वहीं का वहीं है... इडियट कहीं का!" फिर खिलखिला कर हँसने की आवाज़ फ़ोन में गुंजने लगी... वैदेही फिर बोल पड़ी... "आई ऍम श्योर.. ये यश ही हो सकता है... और किसकी इतनी हिम्मत?"

यादों की बुलेट ट्रेन वास्तविकता की पटरियों को पीछे कंपकंपाता छोड़ तेज गति से दौड़ने लगी। यश आज जयपुर से प्रस्थान कर कल मुम्बई पहुंचने वाला था! उसके दाएं पैर को 'जयपुर फूट' लगाना पड़ा था... उसका टेस्टिंग सफलता पूर्वक होते ही डॉक्टर ने उसे घर जाने की अनुमति दे दी थी... रात की फ्लाइट से वह मुम्बई पहुँचने वाला था... अंत में यश की माँ ने बात की और 'गुड़ डे' कह कर फ़ोन रख दिया। वैदेही ने उन्हें घर पर आने का निमंत्रण दिया! माँ पास खड़ी उसका इंतज़ार कर रही है यह उसके ध्यान में ही नहीं आया।

विचारों के बवंडर में धूल के आवर्तों में वो ऐसी फंस गई थी कि उसके लिए अपने हमराहियों को हकीकत बयाँ करना मुश्किल हो रहा था! कब तक छुपाये रखती वह विनय के अनंत की यात्रा पर चले जाने का कटु सत्य?
जिन स्मृतियों पर वह मिट्टी डालना चाहती थी उन्हीं पर बार-बार हरी-भरी दुब उग आती थी। क्या करें...जिन्हें हम भूलना चाहते हैं, वो अक्सर याद आते हैं...

माँ प्लेट में करंजी और चिवडा लिए खड़ी थी सामने! वो जानती थी ये दोनों चीजें उसे बहुत पसंद हैं।
असमय पिता के निधन के बाद उनकी तन्हा रातों में चमकता उम्मीद का तारा वही तो थी...उनकी दुनिया अब वैदेही से ही शुरू होती और वैदेही पर ही ख़त्म होती थी ! वैदेही ने माँ को 'जादू की झप्पी' दी और दिवाली के खास व्यंजनों का लुत्फ़ लेने लगी! चिवडा खाने में थोड़ी सी परेशानी हो रही थी लेकिन माँ के सामने उसने करंजी को प्राथमिकता दी ताकि वह उसे चिवडा खाने से न रोके! माँ के हाथ का चिवडा पापा के सभी दोस्तों में प्रसिद्ध था! जब भी उन्हें छुट्टी मिलती, वे चिवडा और सुजी (रवा) के लड्डू डिब्बा भर कर ले जाते! वहाँ नक्सली इलाके में कहाँ से मिलते ऐसे व्यंजन?
पांच साल पहले दीवाली पर उनकी पोस्टिंग गडचिरोली में हुई थी! दिवाली के दो दिन बाद ही उन्होंने मेसेज किया था माँ को ... "जानकी! सुट्टी मिळाली आहे चार दिवसांची..येतो मी... माझ्या साठी डब्बा भरून फराळ तैयार करून ठेव.." वह उनका अंतिम मेसेज था... उसके बाद आई तो सिर्फ उनकी शहादत की ख़बर और तिरंगे में लिपटा ताबूत! नक्सलियों ने जंगल में जगह-जगह बिछाये डाईनामाइट की भेंट चढ़ गएँ थे वो और उनके तीन साथी!
उसके बाद माँ ने पहली बार ये दोनों स्वादिष्ट व्यंजन बनाये थे अपनी बेटी के लिए!
पिता की याद से वैदेही की आँखें भर आई.. वह प्लेट रखने का बहाना कर रसोई की ऒर चल पड़ी... उसे पता था.. ये आँसू बड़े बेदर्दी होते हैं.. पल भर तो मोतियों से चमकते हैं और अगले ही पल टूटी माला के मोतियों से पलकों से फिसल कर बिखर जाते हैं....दगाबाज! पल में सारा राज खोल देते हैं!
माँ की आँखों से आँखें मिलाने की हिम्मत कहाँ थी उसमें.. वह सीधी अपने कमरे की ऒर चली गई.. मोबाइल पर सर्फीन्ग करते-करते उसकी नज़रें पुराने रील्स पर अटक गई!
"गेट वे ऑफ़ इंडिया" के सामने प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक का वीडिओ था वो! विनय बिच में खड़ा रहकर ढ़ोल बजाता, पास में लाउड स्पीकर लिए विभा बिच-बिच में गाना गाती और गोल दर्शकों के घेरे के बिच में यश, वैदेही और वज्र अपने अभिनय का जलवा दिखाते! कितनी भीड़ इकठ्ठा हुई थी उस दिन! हर डायलॉग पर तालियाँ ही तालियाँ। विषय भी युवाओं का अति प्रिय! "प्रेम विवाह या सर्वसम्मति से विवाह"

वैदेही यादों की अँधेरी गुफ़ा के एक छोर से अंदर प्रवेश तो कर चुकी थी लेकिन मीलों दूर तक ढूंढ़ने के बाद भी उसे बाहर निकलने के लिए दूसरा छोर नज़र नहीं आ रहा था..तभी आबा का फ़ोन आया और स्मृतियाँ वैदेही को यथार्थ की खुरदरी जमीन पर पटक कर रफुचक्कर हो गई।

माँ ने फ़ोन पर बात की और शाम को आने का वादा कर वह जल्दी-जल्दी काम निपटाने लगी...
सासवड़ से वज्र की माँ प्रतिभा जी और वज्र के दादा-दादी आए थे! वज्र को जी भर देख लेने के बाद आबा से बात करते-करते जब जानकी और वैदेही का सन्दर्भ आया तो सभी ने उन्हें मिलने की इच्छा जताई.. आबा ने 'कल उन्हें बुलाता हूँ' कहकर सबकी जिज्ञासा को शांत कर दिया!
वैसे भी पाडवा (नव वर्ष) के बाद बड़ों का आशीर्वाद लेने तो जाना ही था! जानकी ने हामी भर दी और दोनों माँ-  बेटी उन्हें मिलने पहुँच गई! साथ में एक डिब्बे में चिवडा, करंजी, शक्करपाला लेना वैदेही नहीं भूली!
वज्र के दादा-दादी ड्राइंग रूम में ही बैठे थे.. जानकी और वैदेही ने उन्हें प्रणाम किया और उन्होंने दोनों को असीम प्रेम से गले लगाकर दुआओं से उनकी झोली भर दी! "पोरी! किती वर्षानंतर भेटलीस गं...वैदेही! बाळा! आयुष्याची डोर लई मजबूत गं बाय तुमची... देवाची कृपा हाय गं पोरी... औक्षवंत हो!"
जानकी-वैदेही के आँखों से आँसू बहने लगे.. ज़िन्दगी की धूप-छाँव में दादा-दादी ने उन्हें सहारा दिया था मानों पक्षिणी ने अपने पंखों तले लेकर उन्हें स्नेह की गर्माहट दी हो...कई बार खून के रिश्ते अनजान लोगों के सामने बौने लगने लगते हैं। कई बार उनसे स्वार्थ की बू आती हैं पर जो रिश्ते त्याग, समर्पण की आग में पक कर परिपक्व होते हैं...वो कुन्दन से चमकते हैं। वक़्त की मार भी उन्हें टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित नहीं कर सकती।
पीहर से कारी कोयल भी आ कर आम्रवृक्ष पर कुहूंकने लगे तो कितनी खुशी होती हैं न.. ये तो वो थे जिनके आँगन में खेल-कुद कर जानकी-वैदेही बडी हुई थी ....गाँव की खुली हवा में...स्वच्छन्द वातावरण में, प्यार से भीगे आँचल तले! अब तक वज्र भी धीरे-धीरे चल कर दिवाणखाने  में पहुँच चूका था...दिवाणखाने का भावभीना दृश्य देखकर पल भर के लिए वह नि:शब्द हो गया..

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|

कहानी का अगला भाग अगले अंक में


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  • बहुत खूब.. दीप से दीप जलेंगे तो जीवन रोशन हो जायेगा! प्रेरणादायक सुन्दर प्रस्तुति!