भाग ३८
जानकी जी सर्द रात में शाल ओढ़ आराम कुर्सी पर सोने की कोशिश कर रही थी लेकिन अड़ियल बच्चे सी यादें गोद में आ कर बैठ गई थी न तो वह उन्हें दुत्कार कर अलग कर सकती थी न दुलार कर सीने से लगा सकती थी! शाल की गर्माहट में उन्हें श्री की ऊष्मा महसूस हो रही थी!
वो बीती बातें, वो श्री के बाहों के शमियाने, वो कड़कड़ाती ठण्ड, वो शिमला की फूलों से लदी घनी वादियाँ, वो ऊँची- ऊँची पहाड़ियां, वो लाल-हरें छतों के बीच से टुकुर-टुकुर निहारती पवनपुत्र हनुमान जी की आकाश को चुमती मूर्ति मानों पर्यटकों को सम्मोहित कर रही हो! राम भक्त हनुमान और उनकी सेवा में हाजिर वानर सेना...हनुमान जी के अनन्य भक्त! मजाल है कि कोई चीज उनकी पैनी नज़र से बचे फिर वह आपकी फलों की टोकरी हो, फूल मालाएं हो, मूंगफली के दोने हो या आंखों पें लगा काला चश्मा!
ऐसे ले भाग खड़े होंगे यें वानर, हमारे पूर्वज कि हम मुँह में उंगली डाल विस्मय से देखते ही रह जाएंगे और यें पहुँच जाएंगे ऊँची पहाड़ी पर लहराती पेड़ की डालियों पर झुला झूलने! आप भले ही चिंतामग्न क्यों न हो, थोड़ी देर बाद यें आपको चिढ़ाते हुएँ सब चीजें यहाँ-वहाँ पहाड़ी पर फेंक जायेंगे मानों कह रहे हो... सावधान! यह हमारा क्षेत्र है! न तो यहाँ आपकी मनमानी चलेगी न पर्यावरण से छेड़-छाड़!
जानकी जी खोई थी अतीत में और यादों के परिंदे थक कर सुस्ता गएं थे अब आँगन के गुलमोहर पर! सर्द हवा का तेज झोंका उनके करीब से गुजरा मानों श्री उनके गालों को सहला कर कह रहा हो... "सो जाओ मेरी जान! कल जल्दी उठना भी तो है... वैदेही का इंटरव्यू है न!"
जानकी जी अचानक सचेत हो जाती है और हवा से कंधे से फिसल गई शाल को ठीक कर इधर-उधर देखती है और मन ही मन कहती है, " यह तो श्री की आवाज़ थी... श्री! कहाँ छुपे हो तुम? "
अगले ही पल वैदेही की आवाज़ से वह सकपका जाती है।
"आई! झोपली नाहीस अजून?
क्या सोच रही हो माँ? क्यों इतनी चिंता करती हो? तुम्हारी बेटी अब बड़ी हो गई है! उसे काबिल बना दिया है माँ तुमने! अब किस बात की चिंता? आई! वो तारा देखा? कितना चमक रहा है! पप्पा देख रहे है हमें! तुम दुःखी रहोगी तो कैसे खुश होंगे वो ? माँ! वो हमारे साथ है...हमेशा रहेंगे...
माँ! चलो अंदर! सर्दी लग जाएगी! "
वैदेही ने माँ को कमरे में ले जा कर सुलाया, रजाई ओढ़ाई और अपने कमरे में चली गई!
वह इतनी बड़ी हो चुकी थी कि एक समर्पित, जवाँ माँ की पीड़ा को समझ सकती थी, महसूस कर सकती थी मगर उसके पास इस समस्या का कोई हल नहीं था!
एक शहीद की पत्नी के लिए खुद के प्यार की निशानी, अपनी बच्ची की सही परवरिश के लिए भरी जवानी में विधवा सा जीवन खुशी-खुशी स्वीकार करने से बड़ी कुर्बानी क्या हो सकती थी ?
परिंदों की चहचहाट से वैदेही की आँख खुल गई और वह इंटरव्यू के लिए जाने की तैयारी में लग गई! जानकी जी उसके पहले ही उठ कर नाश्ता बना चुकी थी और उसे देख कर चाय का पानी गैस के चूल्हे पर चढ़ा चुकी थी।
वैदेही ने गुलाबी फूल-पत्तियों वाला सूती कुर्ता पहना था और प्लाझो! उसके गोरे रंग पर यें कुर्ता बहुत फब रहा था!वैदेही ने देवघर में जा कर गणपति बाप्पा का आशीर्वाद लिया, फिर पिताजी के फोटो प्रणाम किया, माँ के चरण छूँ कर, जादू की झप्पी दे कर, पर्स उठा कर वह चल पड़ी।
परेल के एक बड़े बिज़नेस पार्क में 'वज्र एक्सपोर्ट हाउस' का ऑफिस था! वैदेही कुछ पहले ही निकल चुकी थी! वह नहीं चाहती थी कि किसी भी कारण से उसे देर हो जाएँ ! गूगल मैप का नेवीगेशन शुरू कर, पता ढूंढ़ कर वह समय से पहले ही वहा पहुँच गई थी!
स्वागत कक्ष की सजावट बहुत सुन्दर थी! गिनी-चुनी चीजें और वह भी सलीके से रखी हुई! रिसेप्शन पर लगे सुन्दर पेंटिंग ने उसका मन मोह लिया था! वहाँ बैठी लड़की ने उसका पत्र देखा और उसे इशारे से सोफा पर बैठने के लिए कहा!
वैदेही ने टीपॉय पर रखी पानी की बॉटल से पानी पिया और वहाँ रक्खी रखें व्यापार से सम्बंधित पत्र-पत्रिकाएं खंगालने लगी तभी उसकी नज़र एक निर्यात से सम्बंधित आलेख पर पड़ी! वह ध्यान से उसे पढ़ने लगी! पढ़ते-पढ़ते कब एक घंटा बीत गया उसे पता ही नहीं चला। उसने घड़ी की ऒर देखा। उसे आकार करीब एक घंटा हो चूका था! उसने माँ को फोन करने के लिए स्पीड डायल किया तभी रिसेप्शनिष्ट ने उसे केबिन की तरफ जाने का इशारा किया! इसने झट से फोन कट कर साइलेंट मोड़ पर ड़ाल दिया और वह केबिन की तरफ बढ़ी!
"मे आई कम इन सर?" उसने पूछा और 'यस प्लीज' सुनते ही वह आगे बढ़ी और सामने बैठे व्यक्ति को देख कर उसकी आँखें खुली की खुली रह गई! बॉस की कुर्सी पर वज्र बैठा था। उसने वैदेही को इशारे से बैठने के लिए कहा और उसकी फ़ाइल मांगी!
वैदेही एकटक उसे देखती ही रह गई। तभी वज्र बोल पड़ा, "मिस वैदेही! योर फाइल प्लीज!" और वैदेही ने फाइल आगे की! फाइल को देखते-देखते उसने बेल मारी और एक असिस्टेंट अंदर आ गई! वज्र ने दो नाम कहे और उन्हें अंदर भेजने के लिए कहा!
कुछ ही पलों में दो व्यक्ति अंदर आएं और पास की कुर्सीयों पर बैठ गएँ! वज्र ने वैदेही को फाइल देख कर उसे लौटा दी और उनकी तरफ जाने को कहा!
असली इंटरव्यू तो अब शुरू हुआ था! वो सवाल पर सवाल कर रहे थे और वैदेही पहले तो थोड़ी झिझक रही थी लेकिन अगले ही पल संभल कर वह आत्मविश्वास से जबाब देने लगी! अब वह तनावन्मुक्त हो कर बात कर रही थी! दोनों सवालों की बौछार कर रहे थे और वैदेही मानों हर बात का सटीक जबाब दे रही थी! उन्होंने अंतिम सवाल दागा, " आपको अगर चुनने का पर्याय दिया जाय तो आप कहाँ से काम करना चाहोगी? घर से या ऑफिस से? "
वैदेही इस सवाल से बहुत खुश थी! उसने फट से जबाब दिया, " सर! पहली पसद हैं घर! "
दोनों मुस्कुरायें और उन्होंने उसे 'ऑल द बेस्ट' कहा और वो बाहर चले गएँ!
वैदेही को उन्होंने बाहर सोफे पर इंतज़ार करने को कहा।
स्वागत कक्ष में बैठी लड़की ने उसे ट्रे में चाय और बिस्किट लाकर दिएँ और इंतज़ार करने को कहा! वैदेही थक गई थी। उसने चाय का कप उठाया और साथ में बिस्कुट भी! उसे अदरक वाली चाय...एकदम कड़क और गरमा-गर्म पीना बहुत पसंद था! वह खुश थी कि चाय उसके पसंद की थी।
अब तक इंटरव्यू के लिए आएं उम्मीदवारों की कतार ख़त्म हो चुकी थी! सभी बाहर सोफा पर अगले बुलावे का इंतज़ार कर रहे थे!
वैदेही ने माँ को फोन लगाया और कम से कम एक डेढ़ घंटा और लग सकता हैं कह कर फोन डिसकनेक्ट कर दिया! आखिर इतने लोगों के सामने वो और क्या बात करती? तभी केबिन से वो असिस्टेंट बाहर आई और उसने तीन उम्मीदवारों के हाथ में लिफाफे थमाएं और बाकी सब को 'गुड बाय' कह दिया!
वैदेही लिफाफ़ा खोल ही रही थी कि रिसेप्शनिस्ट ने उसे कहा "मैडम! वज्र सर ने आपको रुकने के लिए कहा है!"
वैदेही बात को कैसे नकार सकती थी? वह अपने चेहरे के पल-पल रंग बदलते भावों को छुपाने के लिए मैगज़ीन पढ़ने लगी.. बिल्कुल चेहरे के सामने रख कर!
अब तक सभी उम्मीदवार लौट चुके थे! सिर्फ वैदेही ही वहाँ मौजूद थी! करीब दो घण्टे के ऊपर समय बीत चूका था! सूरज ने अपनी नजरें वक्र कर दी थी! रिसेप्शनिस्ट को पूछ कर वह वाश रूम की तरफ बढ़ी! पंद्रह मिनिट के बाद वह लौटी तो वज्र सोफा पर विराजमान था! वैदेही के आते ही वह बोल पड़ा, " चले अभी? "
वैदेही ने बिखरें हुए बालों को संवार दिया था। पसीने से तर-बतर चेहरे को धो कर उसने चेहरे को लक्मे के टेलकम पाउडर से फ्रेश कर दिया था! धनुष सी वक्र भौओं के बीच में एक छोटी सी बिंदी चमक रही थी और चेहरे पर एक अलग सी आभा!
वज्र के साथ-साथ वह चलने लगी! सभी के सैलूट स्वीकारते हुएँ और शेक हैंड करते-करते उन्हें गाड़ी तक पहुँचने में दस मिनिट लग गएँ!
वज्र ने वैदेही के लिए गाड़ी का दरवाजा खोला और दोनों गाड़ी मैं बैठ गएँ।
वैदेही उसकी चकाचौंध से अभिभूत थी! अनपेक्षित कुछ भी नहीं था लेकिन आँखों-देखा मन पर गहरा असर डालता है न! वह दो परिवारों के बीच के अन्तर को जानती थी लेकिन वज्र के परिजनों ने इस बात का एहसास उन्हें कभी होने नहीं दिया, यह हकीकत सूरज की रोशनी सी साफ़ थी।
यहीं वजह थी वैदेही के मानसिक द्वन्द की! एक तरफ खुद्दारी तो दूसरी तरफ एक सह्रदय इन्सान की इंसानियत! ज़िन्दगी के कई मौके ऐसे थे जहाँ आबा का दिल खुद-ब -खुद वक़्त की भट्टी में तप कर कुन्दन सा चमकता वैदेही ने स्वयं भी देखा था! वज्र भी उनकी विरासत को ही आगे बढ़ा रहा था...
अब गेंद वैदेही के पाले में थी! यह उसे निश्चित करना था की गेंद को गोल में डालें या उसे बाहर का रास्ता दिखाएँ! वह इस कड़वी हकीकत को जानती थी कि ऊपरवाला भी बार-बार बॉल को गोल पोस्ट में डालने के मौके नहीं देता!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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