तन्हाईयों में खुद से गुफ़्तगु में शामिल हुएं!
अभी न मुझ से मेरा हाल पूछो ए बेवफा!
संभल न पाएँ जो नयन-कटार से घायल हुएं!
रिश्तों की देहरी पर दीप जलते रहें,
चाँद-तारों की महफ़िल में ख़्वाब पलते रहें!
अभी न मुझ से मेरा हाल पूछो बेवफ़ा,
खुदा की खैर हैं कि बदनुमा दाग से रुखसत हुएँ!
दिल की भीगी रेत पर निशां पुराने हुएँ,
आँखों की पुतलियों में अक्स देख दीवाने हुएँ!
अभी मुझ से मेरा हाल-ए-दिल पूछो न बेहया..
अभी वक़्त कहाँ बीता आईना देख होश में आएं हुएं!
वो खेल रहें थे दिल से कंचे समझ कर,
हम पागल हुए छैल-छबिला रूप रंग देख कर...
वो ज़िस्म की चाहत में पतंगे उड़ा रहें थे ...
हम अपनी हिफाजत में सेज़ पर कली से सिमटे थे...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |