मन की कसक!

परिंदे चहचहॉं रहे थे, गुलाब, चमेली, पारिजात सूरज की रश्मियों को देख खिलखिला रहे थे, बादलों की हवा के झोंको के साथ चहलकदमी जारी थी! सूरज धीरे-धीरे पश्चिम की ऒर बढ़ रहा था और सुबह की चाय के साथ दो बिस्कुट खा कर मनु खिड़की से आँगन में फुदक रही गौरय्या को देख मन ही मन उदास हो रही थी!
'कृपामई नर्सिंग होम' में यह उसका ग्यारहवा दिन था! भाई-भाभी की धुंधली सी छवि उसकी आँखों में तैर रही थी! शायद वो ही उसे यहाँ छोड़ गए थे उस हादसे के बाद! कल ही वहाँ के डॉक्टर कह रहे थे, 'बेटा! तुम्हारी किस्मत बुलंद है तभी तुम इस भयानक हादसे में बच गई! अब कैसी हो? बचपन याद आ रहा है? और मनु ने हॉं में अपनी गर्दन हिलाई थी! 
हॉस्पिटल एक आश्रम सा ही था! चारों ऒर हरियाली! नीम, पीपल के वृक्ष मानों आश्रम की रखवाली कर रहे थे, नन्हें-नन्हें पौधे खुशुनुमा बयार से बतिया रहे थे और लताएँ पेड़ का सहारा लेकर सूरज को चिढ़ा रही थी! मनु सोच रही थी,' कितनी खुश है प्रकृति! सिर्फ मैं ही कराह रही हूँ इस जहाँ में! वक़्त ने करवट क्या ली, सब कुछ तहस-नहस हो गया... वो बरसों पुराना आशियाना, माता-पिता, अडोसी-पडोसी, सखी-सहेलियाँ... सब कुछ लील गया खूंखार दैत्य सा वह पल!'
खिड़की को बंद कर वह कमरे में लगे पलंग पर लेट गई! सोच-सोच कर वह थक गई थी! कई सवाल उसके मस्तिष्क में उथल-पुथल मचा रहे थे और वह उनकी बेरुखी से परेशान हो कर आँखें भींच कर सब कुछ भुलाने के लिए सोने की चेष्टा कर रही थी पर नींद भी अपनी मनमानी पर उतर आई थी! पलके बोझिल हो रही थी पर नींद अड़ियल समधन सी रूठ कर बैठ गई थी! 
थोड़ी सी झपकी लग ही रही थी कि मावशी भोजन की थाली लेकर आ गई! बड़ी-बड़ी ज्वार की दो भाकरी और उसळ, साथ में लहसुन की चटनी और कच्चे प्याज़ के दो टुकड़े! 
उसने मनु को हिला कर उठाया और खाना खाने के लिए कहा! उसे पता था ये लड़की बड़ी जिद्दी हैं, दस बार कहूँगी तब जाकर कुछ खायेगी! माँ तों रही नहीं इस दुनिया में कि डांट-डांट कर दो कौर खिलाएगी! अभी-अभी कुछ सुधार हुआ हैं, कुछ खायेगी-पियेगी तों जल्दी ठीक हो जाएगी... मनु ने भारी मन से दो कौर मुँह में डाले... मावशी उसे चेतावनी दे रही थी... "कुछ भी नहीं रहना चाहिए थाली में झूठा... समझ गई ना..." मैं अभी आती हूँ... कह कर वह चली गई और मनु के मन की कसक पैर में चुभे बोरली के कांटे सी फिर बढ़ने लगी! मनु अब तक जान गई थी कि मावशी अब कल सुबह ही आएगी उसे नहलाने! घर-परिवार भी तो संभालेगी न अपना!

मन ही मन वह अंधेरों में जुगानु तलाशने लगी! 
घर... कहाँ है मेरा घर? उस रात...
बस! एक जोर का धमाका हुआ और बाद में... कुछ याद नहीं आ रहा... बस! यहीं पर हूँ मैं तब से ... वो 'शॉक ट्रीटमेंट'.. वो दवाईयाँ.. वो नाटे से गोल-मटोल डॉक्टर...और उनकी शहद सी मीठी बोली! ऐसा लग रहा था मानों एक डॉक्यूमेंटरी देख रही थी वह ... फिर वहीं बेचैनी, वहीं अनुत्तरित असंख्य प्रश्न.... वहीं मन की पीड़..उस भीड़ में कौन था मेरा अपना?

वह फिर उदास हो गई! कभी गले में माँ ने पहनाये 'विघ्नहर्ता' को देखती तो कभी छत पर चिपक कर, कीट को गटक कर धीरे-धीरे रेंगती छिपकली को! उसका मन विव्हल हो उठता.
.. बाबूजी! कहाँ हो आप? इतनी बड़ी छिपकली! माँ! तुम्हें पता है न.. मुझे बहुत डर लगता है छिपकली से... मुझे अपने पास बुला लो न माँ... माँ! कहाँ हो तुम! भैया भी नहीं आए मुझे घर ले जाने! दो दिन पहले कुछ कागज़ पर मेरा अंगूठा ले कर चले गए..दो-तीन दिन में लौट आता हूँ गुड़िया कह कर... देखो न..अभी तक नहीं आएं! भैया वर्ल्ड टूर से तो कब के लौट चुके थे न माँ... अभी तक तो ससुराल में ही तो रुके थे.. फिर अभी तक क्या कर रहे हैं? 
मनु पल-पल अस्वस्थ हो रही थी! 
डॉक्टर कह कर गए थे कल.. अब तुम ठीक हो गई हो! फ़ोन कर बताता हूँ तुम्हारे रिश्तेदारों को... फिर कोई ना कोई आएगा तुम्हें लेने.. अच्छा बेटा!
Bye! Good Night!

मनु की आँखें लगी रहती थी खिड़की-दरवाजे की ऒर... जरासी आहट हुई नहीं कि वह दौड़ कर खिड़की से झाँकने लगती! आश्रम के मुख्य द्वार की ऒर ही खुलती थी उसके कमरे की खिड़की! 

पंद्रह दिन बीत चुके थे.... न भैया आएं न भाभी! एक-एक पल एक-एक युग सा बीत रहा था! आशा की डोर, राखी का रेशमी बंध सब बेमानी से लगने लगे थे! 
आज मावशी कुछ मिठाई लेकर आई थी! गणपति विसर्जन के पहले उसने गणपति जी को मोदक का भोग लगाया था अपने घर में! 
सालों से काम कर रही थी वह 'कृपामई' में! बालों की सफ़ेदी बहुत कुछ कह चुकी थी फिर भी आस के कुछ धागे पकड़ रक्खे थे उसने अपने झुर्रियों से पटे हाथों में! उड़ते परिंदे के पर गिनने में माहिर मावशी का तजुर्बा सच्चाई को भाँप चूका था! वह समझ गई थी ....
लोभ की पट्टी आँखों पर बँधी हो, रिश्ते-नाते स्वार्थ की भट्टी में स्वाहा हो चुके हो, छल-कपट की चौसर बिछ चुकी हो, ज़मीर पैसों की ताकड़ी में तूल चूका हो तों फिर कैसी इंसानियत, कैसे मानवीय मूल्य? 

डॉक्टर को चाय देने पहुंची मावशी हकीकत जान चुकी थी उनकी बातों से! स्वार्थ का कोहरा मतलबी दुनिया के बाशिंदो के जमीर को अजगर सा गटक चूका था, सब कुछ दफ़न हो चूका था और मनु के भाई-भाभी सात समंदर पार, सब कुछ समेट कर पहुंच चुके थे जीवन की नई पारी खेलने के लिए, मनु को बेसहारा छोड़ कर!

आखिर डॉक्टर कब तक इंतज़ार करते? उन्होंने एक
NGO के प्रतिनिधि मण्डल को बुला कर हालात से उन्हें परिचित कराया! उनके लिए यह कोई नया अनुभव नहीं था! वक़्त बदलते ही इंसान बदलते हैं यह जानते थे वो मगर मनु... मनु के लिए सब कुछ नया नया था.. अविश्वसनीय, अकल्पनीय!
तभी मुस्कुराती हुई मावशी मनु को मोतीचूर का लडडू खिला कर बोली, " मनु! ये तेरा नया परिवार! तुझे अपने साथ ले जाने आया हैं..
वहाँ तुम्हारे बहुत सारे दोस्त तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं... मनु कुछ समझ पाती इसके पहले ही NGO की अध्यक्षा ने मनु के माथे पर प्यार से हाथ फेरा और कहा, बेटा.. चलोगी न तुम्हारे नए आशियाने में? मनु ख़ामोशी से उनकी उंगली पकड़ उनके साथ चलने लगी...उसकी ख़ामोशी उसके पीछे सवालों के असंख्य शूल बिखेर कर जा रही थी...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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