शीर्षक: नारी!
सृष्टि की तू अनुपम रचना,
सुन्दर मन की तू अर्चना,
जीवनदायिनी तू गंगा-जमुना ,
पूनम की तू उजली रैना ||१||
धरती सी क्षमाशील तू,
अम्बर सी विशाल- ह्रदय तू ,
हिमशिखरों सी शुद्ध-धवल तू,
हिरे सी कठोर, तेजस्वी तू||२||
जगत जननी तू, माँ भवानी,
तू प्रिया, तू भगिनी प्यारी,
तू भार्या, अर्धांगिनी न्यारी,
रिश्तों की धूरी तू, त्रिभुवन वारी ||३||
नए युग की तू है नारी,
शक्ति और ज्ञान की खानी,
घर का संबल, सबकी की दुलारी,
ममता और प्रेम की धानी||४||
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |
….......