अरुण छंद!
अरुण छंद।

आँधियाँ, जब चली, लौ बुझी दीप की।
जंग  है, ज्वार  से,  यह लहर-सीप की।।
तोड़ दो, बंध अब, खोल दो  द्वार  को।
चित्त में, भर घुटन, तोल मत प्यार को।।

प्रीत की, रीत है, बांसुरी तू बजा। 
साँवरे, तू बता, आखरी क्या रजा।।
भूल कर, प्रिय विरह, है चली राधिका।
टूटता, धीर जब , श्री  पढ़े  याचिका।।

जश्न है, प्यार का, है मिलन रूह का।
मार्ग है,  तोड़ है, चक्र से व्यूह  का।।
प्रेम है, पथ कठिन, कंटकों  से भरा।
आग है, प्रीत की, पर जिया है हरा।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।


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