भाग ३६
आबा ने फोन पर जानकी जी की खैर-ख़बर ली, उनकी तबियत के बारे में पूछा और वज्र के आने के बाद उन्हें मिलने की इच्छा व्यक्त की! जानकी जी ने तुरंत उन्हें अपने घर पर ही भोजन करने के लिए आमंत्रित किया लेकिन आबा ने कहा, " पोरी आज नाहीं! निवांत येईन मी जेवायला। दुपारी येतो आम्ही तुम्हाला भेटायला! "
जानकी जी समझ गई। आबा बिना किसी महत्वपूर्ण बात के कभी स्वयं नहीं आते! कुछ न कुछ ऐसी बात हैं जो वो फोन पर नहीं आमने-सामने बैठ कर स्वयं करना चाहते है।
कल्पना के आकाश में जानकी जी का मन उड़ान भर रहा था! कभी उस डाल पर बैठ कर नाचता-चहचहाता तो कभी इस डाल पर बैठ मीठे फल का स्वाद लेता। कभी सर्द खुशनुमा बयार ठिठुरन पैदा करती तो कभी मंद-मंद हवा के झोंकें उनकी उलझी लटों से छेड़खानी करने लगती! वक़्त के झंझवातों से, जलजलों से छोटी उम्र में ही लड़ते-भीड़ते वह अब वज्र सी कठोर बन गई थी!
बेदर्दी दुनियावालों ने क्या आसानी से मिलने दिया था युवा जोड़े को? बिल्कुल नहीं! इसीलिए अपने-परायों से अनवरत संघर्ष, मान-मनुहार के बाद मिले प्यार में मिठास भी गज़ब की थी! प्यार की बरसात में भीगे चंद साल ही जानकी जी के लिए एकाकी जीवन का मजबूत सहारा बन चुके थे! श्री और जानकी के प्यार की एकलौती निशानी थी वैदेही।
यशोदा जी के डांटने पर कान्हा अपना मिट्टी से भरा मुँह खोलते हैं तो यशोदा जी को उनके मुख में सारा ब्रह्माण्ड दिखाई दिया था वैसे ही अगर जानकी जी के ह्रदय स्थल को टटोला होता तो उसमें वैदेही की खुशियों का सारा ब्रह्माण्ड छुपा नज़र आता।
रात के गहराते ही यादों के परिंदे मन-उपवन के विशाल वटवृक्ष पर आकर गहरी नींद में खो जाते और अवचेतन मन में यहीं पर श्री और जानकी जी का स्नेह मिलन होता था! दोनों एक-दूजे में समा जाते और नई सुबह का इंतज़ार करते! प्राची के अधरों पर उभरी भोर की लालिमा को देख कर ही परिंदे अपने-अपने आकाश में उड़ान भरने लगते थे नई सुबह का आलिंगन कर!
दरवाज़े की घंटी बजते ही जानकी जी की तन्द्री भंग हो गई। वह जल्दी-जल्दी पल्लू कमर को लपेट, नागिन सी चंचल लटों को पीछे कर दरवाजा खोलने चली गई। बाहर वैदेही खड़ी थी! वह अंदर आते-आते बोल पड़ी, " आई! का गं एवढा वेळ लागला? "
"वैदेही! आबा और वज्र आने वाले हैं दोपहर को...इसलिए जल्दी-जल्दी काम निपट रही थी! तू भी जल्दी आ जा... हाथ-पैर धो कर!
दोनों माँ-बेटी ने भोजन कर सारा काम फटाफट कर दिया! नाश्ते के लिए भीगी हुई मुंग दाल को दरदरा पीस कर रख दिया था। साथ में हरी मिर्च, कोथमिर, पुदीना, अदरक, कैरी डाल कर चटपटी चटनी भी बना कर रख दी थी! यह चटनी सैंडवीच में भी काम आनेवाली थी और दाल के पकौड़े के साथ भी! इसीलिए जानकी जी ने एक ब्रेड भी मंगवा दी थी ताकि वज्र के लिए सैंडवीच भी बना सकें!
गैस के चूल्हे पर रक्खे तपेले में उफन कर आएं दूध को देख कर जानकी जी के मन में कुछ प्रश्न उभर कर आ गएं! कहीं वैदेही ने तो...
तभी उनके मोबाइल फोन की रिंग टोन बजने लगी...
" केशवा... माधवा! तुझ्या नामात रे गोड़वा। "
उसने स्क्रीन पर उभर आए नंबर को देखा... आबा का फोन था..
"पोरी! आम्ही येतोय गं " जानकी जी के हाँ कहते ही आबा ने फोन रख दिया! वैदेही ने ड्राइंग रूम में सभी चीजों को व्यवस्थित किया और माँ को मदद करने लगी! सलाद काट कर बाऊल में रख दिया था और चाय का पानी, चाय-पत्ती, थोड़ी सी चीनी भी तपेली में डाल कर तैयार रक्खा था ताकि बातों के लिए वक़्त मिल सके!
घर का सारा काम खुद ही करती थी दोनों!
दोनों अपने-अपने कमरे की साज-सज्जा व्यवस्थित कर रही थी तभी बेल बजी और वैदेही झट से दरवाजा खोलने दौड़ी चली गई।
आबा और वज्र दरवाज़े पर खड़े थे। आबा के चरण स्पर्श कर वैदेही ने आबा और वज्र को अंदर आने के लिए कहा। अब तक जानकी जी भी बाहर आ चुकी थी। उन्होंने भी आबा के पैर छुएँ। वज्र ने जानकी जी का आशीर्वाद लिया और दोनों सोफा पर बैठ गएं। वैदेही पानी ले कर आई और दोनों पलभर के लिए वहीं बैठ गई! आबा ने दोनों को आराम से बैठने के लिए कहा!
वज्र आज बहुत खुश था! आबा ने उसकी कहीं बात की ऒर पूरा ध्यान दिया था! आबा ने जानकी जी की रिपोर्ट्स के बारे में पूछा और सीधा मुख्य मुद्दे पर आए!
"वैदेही! काय ग पोरी! आई ला मदद करायची आहे म्हणे तुला " आबा! ती करते की मला मदद..सगळ्या चं कामात!"
वैदेही के पहले जानकी जी बोल पड़ी! तभी वैदेही ने कहा, " हाँ आबा! अब आई थक गई हैं! देखा आपने कितनी कमजोर हो गई हैं! इसलिए मैंने वज्र को कहा था... घर बैठे कोई काम मिल जाये तो.. फ्री-लांसर के रूप में .. तो थोड़ा अनुभव भी मिलेगा और थोड़ी मदद भी होगी!
तभी जानकी जी बोल पड़ी, " वैदेही! तू अभ्यास कर... मी आहे नं... मैं संभाल लुंगी बेटा! तू सिर्फ पढ़ाई में ध्यान दे! "
नहीं माँ! सारा बोझ आप पर डाल कर मैं चैन से नहीं बैठ सकती! अब आपको सिर्फ मेरा नहीं, अपना खुद का भी ध्यान रखना है! दो दिन आप बीमार थी तो मैं अच्छी तरह समझ गई घर में आप की अहमियत! माँ! अब और नहीं! थोड़ा भार मुझें भी उठाने दो नं माँ... कह कर वह माँ से लिपट गई! माँ अपने आँसू रोक नहीं पाई... दोनों का एक-दूजे के प्रति प्रेम भाव देख वज्र और आबा भी भावुक हो गएँ!
आबा ने जानकी को चाय बनाने के लिए कहा और वैदेही से बात करने लगे! जानकी जी को अकेला देख वज्र उन्हें मदद करने गया लेकिन जानकी जी ने उसे चटनी, कैचअप का बाऊल और पानी के ग्लास दे कर वापस बाहर भेज दिया! जानकी जी मुंग दाल के पकौड़े बनाने लगी और बाद में दो सैंडवीच बना कर बाहर ले आई।
आबा ने तब तक वैदेही को काम के लिए कितना समय दे आएगी? किस तरह का काम करना पसंद हैं? जिम्मेदारी कैसे निभाओगी? कितना मेहनताना चाहती हो? जैसे सामान्य प्रश्न पूछें और उसकी काम के प्रति गंभीरता का मूल्यांकन किया। आबा ने उसे वेबसाइट पर जा कर आवेदन पत्र सबमिट कर इंटरव्यू के कॉल का इंतज़ार करने को कहा! उन्होंने साफ़ कर दिया कि काम में रिश्ते, सम्बन्ध नहीं आने चाहिए! काम का उत्तरदायित्व अगर लेते हो तो उसे पूरी जिम्मेदारी से निभाना होगा!
वैदेही समझ गई आबा के यहाँ काम सिफारिश से नहीं हुनर से ही मिलेगा! वह बहुत खुश थी! आबा की बातें, काम करने का तरीका उसे बहुत अनुकरणीय लगा! वज्र भी सारी बातें मन लगा कर सुन रहा था! उसका सीना आज गर्व से तन गया था! वह जान गया था आबा के निरन्तर प्रगति का राज!
दाल के पकौड़े बहुत ही स्वादिष्ट बने थे साथ में पुदीने की चटनी! आबा को अपने बचपन के दोस्त की याद आ गई! घर के पास ही एक राजस्थानी परिवार रहता था! जब भी उनके घर पर दाल के पकौड़े बनते, उनके दोस्त की माँ आबा के लिए एक दौना भर कर पकौड़े जरूर भेजती और साथ में पुदीने की और इमली की चटनी!
कैसा अनोखा देश है नं हमारा! अलग-अलग भाषा, धर्म, जाति, वेशभूषा, खान-पान, संस्कृति.... मानों शांत चांदनी में नहाएं सरोवर में खिले असंख्य कुसुम...कोमल पंखुड़ियों के सुन्दर कमल पुष्प! अलग-अलग रंग, अलग-अलग ढंग! मानों सूर्य की सुन्दर जीवनदायिनी रश्मियाँ... जिसमें समाएं हैं इंद्रधनुषी सप्त रंग!
तभी वैदेही के मोबाइल फोन की रिंग टोन बजने लगी...
" हर घड़ी बदल रही हैं रुप ज़िन्दगी...छाँव हैं कभी, कभी धूप ज़िन्दगी...
हर पल यहाँ..जी भर जियो, जो हैं समा, कल हो न हो..."
वैदेही ने फोन उठाया और वज्र के साथ वह कमरे की ऒर चाल पड़ी।
यश और विभा नितीन सर के यहाँ जाने को निकल रहे थे... वैदेही और वज्र ने 'ऑल दी बेस्ट' कहा...और लौट आएं हॉल में.. आबा और जानकी जी के पास।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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