यादें जो भुलाई न जाये....
यादें जो भूलाई ना जाये
मन अंतर बस जाती है
बचपन की वे प्यारी बातें
सदा हमें हर्षाती है ।
किया पोषण बड़े जतनों से
माॅं मेरी अति प्यारी थी
जन्म देकर पाला मुझे था
कर पोषण संस्कारी थी ।।
कैसे भूलें उपकार उनके
परम पिता की छवि न्यारी
दादा दादी दिवंगत हुए
मेरे सदैव उपकारी
मिल रहे आशिष दिव्य उनके
तभी कलम यह चलती है
करु मैं वंदन नत होकर के
मनो भावना खिलती है ।।
स्वरचित: अशोक दोशी