दोहे....

माली सींचे बाग को, स्वेद खिलाये फूल|

आयी ऋत रे बावरी, नाचे खग जग भूल ||1||

खाली बैठा बावरा, करे शिकायत रोज|
बैठे-बैठे साहिबा, मिले न मिष्ठी भोज ||2||

जो नर भींचे आँख को, जान सके ना भेद |
मानव रहे सचेत जो, चक्रव्यूह दे भेद||3||
 
बाजी मारो खेल में, पोडीयम है धाम |
तमगों की बरसात में, होगा भारत नाम ||4||
 
बेटा अपंग तुम नहीं, अपंग है संसार|
कलियुग में जाने नहीं, कौशल का क्या सार ||5||
 
श्रीहरि मन की चाह है, मिले विजयश्री साज|
बरसों की मेहनत है, खिले कमलदल आज||6||
 
उड़ान पंछी सी भरूं, नापू सारा व्योम|
बादल से बातें करूँ, कहु ओम शान्ति ओम||7||
 
रण में उतरे बांकुरे, हथियारों की होड़|
जग में रोये साँवरे, शरणागत मुख मोड़||8||
 
अतिशय धनबल से यहाँ, सुख पावे है कौन|
जग जेत्ता हारा यहाँ, जीवन क्षण में मौन||9||
 
मौसम बदला जाय रे, जैसे शिशिर-वसंत|
नव पल्लव खिल जाय रे, होवे विपदा अंत||10||
 
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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