माँ की कोख से,बंद मुट्ठियों मेंअपना नसीब ले आई।
क्यूँ न स्वीकारुँ इसे, स्वयं द्वारा
अर्जित पूँजी जो पाई।
सुख-दुःख मान सम्मान के पीछे,
छिपा है कर्म मतवाला।
इसे न किसी ने दान में ही पाया,
न ईश्वर ही देने वाला।
सागर ने बताया,असीम रत्नों का
भंडार है छिपा मुझमें।
भास्कर ने सुझाया, अनन्त उर्जा
स्रोत है समाया मुझमें।
चाँदनी रात आँखों में उतर कर,
गहरा सकून भर देती।
सरित तरंगें नित नवीन उत्साह
का संचार कर देती।
हरियल वादियाँ झुम-झूम,मन
अति हर्ष से भर देती।
पर्वत की ऊँची चोटियाँ,सपनों
को नित उत्कर्ष देती।
ऊगते सूर्य के संग, नित प्रेरक
संकल्प को दोहराऊँ।
सांझ ढलते-ढलते,उस चाहत को
आकार जो दे पाऊँ।
पांव जमी पर हों जरूर,पर उड़ान
आसमां की कर पाऊँ।
अर्हम् नाद में भरा, शान्ति संदेश
विस्तार से पढ़ पाऊँ।
तभी स्वयं के भीतर जो, सोयी
अनन्त शक्ति जगा पाऊँ।
बाँट कर सारा खजाना जग को,
मुट्ठियाँ खोल कर जाऊँ।
शीला संचेती, कोलकाता।