ज़िन्दगी!
ज़िन्दगी!

ज़िन्दगी! तेरी हर अदा पें प्यार आया,
रोते-रोते मुस्कुराने का हुनर सीखलाया।
गमों की बारिश में तर-बतर मन भाया,
गंगा नहाने का पुण्य मेरे हिस्से आया।।

किसे फुरसत है आँसू बहाने की?
गैरों के खातिर वक़्त बर्बाद करने की?
कल फूल खिला हरी-भरी डाली पर,
आज पड़ा खंडहर की दहलीज पर।।

ज़ालिम ज़माने का दस्तूर-ए-वफ़ा देखा।
अपनों को चिता को आग लगाते देखा।।
वक़्त का चक्का तेज घूमते देखा।
राज रंक बन, दर-दर भटकते देखा।।

ज़िन्दगी! कठपुतली का खेला है बन्दे।
हर शय को अर्श-फर्श चूमते देखा।
खेल-खेल में डोर रच्चणहारे ने खींची,
हर शख्श को धडाम से गिरते देखा।।

ज़िन्दगी! नेमत है नीली छतरीवाले की!
मौका नेकी से गुल्लक अपना भरने का।
जीवन-कालिंदी में कालिया का है बसेरा,
फन पें कृष्ण को नाचते देख हो सबेरा।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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