शीर्षक :भ्रमजाल..
दीन-हीन-बोध भ्रमजाल में भूला युवा जीवन-लक्ष्य!
देश के युवा कठपुतलियां, खलनायकों के सुस्वादु भक्ष्य !
जब विवेकहीन, अनैतिक, गरल युक्त हो युवा मन्तव्य,
उम्मीद करें कैसे, देश का विकासोन्मुख होगा गन्तव्य?
अशान्ति, विस्थापन, विघटन है परिवार, समाज-राष्ट्र में,
उर्वरा भूमि यही वैमनस्य की विष-वेल फलने-फुलने में!
अन्याय, शोषण, अत्याचार, दमन, जननी असंतोष की ही!
ज्वालामुखी सुप्त हो या जागृत, एक दिन आग उगलेगा ही!
जलते घर, बिखरे पर, रोते-बिलखते बच्चे, डरे-सहमे परिवार
भीड़ का उन्माद, आततायियों का प्रहार, कहां लगाएं गुहार?
हत्या, बलात्कार, अपहरण, देशद्रोह, अपराध की चरम सीमा!
न फांसी, न उम्रकैद, मानव अधिकारों की करे परिक्रमा!
न्याय देवता खड़ी असहाय, बन दबंगों की दासी!
कोर्ट-कचहरी के अहाते में छाई श्मशान सी उदासी!
कहां जाएं पीड़िता, कहां जाएं शोषितों का परिवार?
काले कौओं की कांव कांव में खोई हो सत्य की पुकार!
मां की कुक्षी से न जन्म लेता, फलता-फुलता अपराधी!
परिस्थितियां, मनोविकार, विषमता व्याधि विश्वव्यापी !
विश्वास, सहयोग, सम्बल, धीरज ही रोगी
का रामबाण इलाज!
तिरस्कार, अवहेलना, प्रताड़ना बनाएं अपराधी को लाइलाज!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा |