सखी...

शीर्षक : सखी!

खाली-खाली है प्यारी सखी, 

तेरे बिना दिल का कोना!

रंग-बिरंगी फूलों से सजा-धजा,

यादों का मखमली दोना! 

 

बाहों में बाहें डाले बीती,

हंसी-ठिठोली से महकती रातें!

बचपन की मासूमियत से भीगी, 

परियों की पहेलियों सी बातें!

 

वो अल्लहड़पन के किस्से,

खेल-खिलौने, किताबे-बस्ते!   

वो सखी-सहेलियों के बहाने, 

झूठ-मूठ की रुठा-रुठी की दास्ताने!

 

सखी! कोयल बिना सुनी-सुनी,

बौराई अमुआ की डालियाँ !

सखी-सहेलियों बिना सुनी-सुनी,

बाबुल की टेड़ी-मेढ़ी गलियाँ!

 

सखी-साक्षी तू दिल का स्पंदन,

आँखों का पानी, मन का दर्पण!

उफनते दरया में ऊँचा दीपस्तम्भ, 

देहरी का दीप, आँखों का अंजन!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |

 

 

 

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  • बहुत सुन्दर प्रस्तुति 😍😍❤️😍😍