शीर्षक : सखी!
खाली-खाली है प्यारी सखी,
तेरे बिना दिल का कोना!
रंग-बिरंगी फूलों से सजा-धजा,
यादों का मखमली दोना!
बाहों में बाहें डाले बीती,
हंसी-ठिठोली से महकती रातें!
बचपन की मासूमियत से भीगी,
परियों की पहेलियों सी बातें!
वो अल्लहड़पन के किस्से,
खेल-खिलौने, किताबे-बस्ते!
वो सखी-सहेलियों के बहाने,
झूठ-मूठ की रुठा-रुठी की दास्ताने!
सखी! कोयल बिना सुनी-सुनी,
बौराई अमुआ की डालियाँ !
सखी-सहेलियों बिना सुनी-सुनी,
बाबुल की टेड़ी-मेढ़ी गलियाँ!
सखी-साक्षी तू दिल का स्पंदन,
आँखों का पानी, मन का दर्पण!
उफनते दरया में ऊँचा दीपस्तम्भ,
देहरी का दीप, आँखों का अंजन!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |