भाग ६२
यश का घाँव कुछ-कुछ भर गया था। गौरव सर उसकी सादगी, सहनशीलता और अनुशासनप्रियता से बहुत प्रभावित थे! उन्हें महसूस हो रहा था कि जिस बन्दे की उन्हें तलाश थी वो उन्हें मिल गया है। उस पत्थर को तराशने से क्या फायदा जो छेनी के एक घाँव से बिखर जाएं? उन्हें वज्र सा कठोर बन्दा चाहिए था अपने सपने को हकीकत में बदलने के लिए!
उन्होंने उसका हालचाल पूछा और उसे दूसरे चयन प्रक्रिया में समय पर पहुँचने का न्योता दिया। उन्होंने उसे समझाया कि उसके हिसाब से बहुत सारे बदलाव भी करने होंगे खास कर बेहतरीन आयातीत जूते मंगवाने होंगे, विशेषज्ञ डॉक्टर का परामर्श लेना होगा तथा खेल की तकनीक में भी सुधार करना होगा। उन्होंने कहा कि वो नितीन सर से बात कर उन्हें सब समझा देंगे। तब तक उसे अपने महाविद्यालय के कोर्ट पर ही प्रैक्टिस करनी होगी तथा परीक्षा की तैयारी भी करनी होगी ताकि ऐन मौके पर मुश्किलों का सामना न करना पड़े।
यश खुश था कि अब मित्र मण्डली को वह सरप्राइज दे सकेगा। गौरव सर ने उसकी फ्लाइट की टिकट उसे थमा दी। उसने चरणस्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया और कहा, "सर! मैं पूरी जी-जान से मेहनत करूँगा! बस! एक मौका मुझें मिल जाएं! " सर ने उसके सिर पर हाथ रक्खा और उसकी पीठ थपथपाई और 'गुड बाय' कहकर निकल पड़े।
यश भी अपने कमरे की ऒर चला गया। अब उसके दिलों-दिमाग़ में मित्र-मण्डली हा-हुल्लड़ मचाने लगी थी । मन में रंग-बिरंगी पतंगे उड़ रही थी! नीला आकाश उसे आकर्षित कर रहा था। परिंदे भी आकाश नांपने को उतावले थे! कई सपने इन पतंगों के पृष्ठभाग पर चित्रित थे। हवा के झोंके उन्हें क्षितिज सीमारेखा लाँघ ऊँचे आकाश की ऒर ले जा रहे थे। मन हर्षित मयूर सा सतरंगी पँख फैला कर नृत्य कर रहा था। तभी मोबाइल की रिंगटोन जो यश ने अभी-अभी बदल दी थी, बजने लगी...
'जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी... अभी-अभी यहीं था... किधर गया जी..'
विभा का नाम देखते ही वो मन ही मन हँसने लगा! टेलीपैथी भी क्या गज़ब की विधा है! अभी-अभी मन ने उसी को याद किया और मोबाइल पर वर्चुअली वही हाजिर! यश ने फ़ोन उठा कर कहा, " शैतान का नाम लिया, शैतान हाजिर! हो गया न चयन मेरी 'झाँसी की रानी' का! बहुत बहुत बधाई! " तभी विभा बोल पड़ी, " मैंने तो कुछ बोला भी नहीं और सीधी बधाई?" "विश्वास मैडम! विश्वास!! इसे जजमेंट कहते है! बेचारे चयन कमिटी वाले तुम्हें चयनित नहीं करते तो बेचारे नितीन सर के बाल नोंच लेती तुम! जानते थे वो!"
"उनके क्यों! तेरे जरूर नोंच लेती मैं! बड़ा खुद को दोस्त कहता है! एक फ़ोन नहीं कर सकता था! अब कैसा है घाँव? कल की फ्लाइट से आ रहा है न मुझें परेशान करने! तुझे क्या लगा, तू नहीं बताएगा तो मालूम नहीं पड़ेगा हमें! हम भी यार! सारी दुनिया की ख़बर रखते है! खास कर तेरे जैसे खड़ूस की!" विभा बोल पड़ी! अब जो मन में ठूंस-ठूंस कर भरा था, सब उगल दिया था उसने! अब उसे कुछ हल्का-हल्का महसूस हो रहा था।
वह वैदेही के यहाँ जाने को निकली ही थी कि यश का फोन आया! अब वह तरोंताज़ा हो गई थी! दिल का गुबार जो बाहर निकल गया था।
घाँव में मवाद भर जाता है तो बहुत पीड़ा देता है, कांटे सी तकलीफ देता है! यही हुआ था विभा के मामले में! एक तो यश का जाना और ऊपर से फ़ोन न करना, लावा सा उबल रहा था उसके सीने में! अब कुछ ठण्डक पहुंची थी उसके दिल को।
यश का सरप्राइज प्लान तो फुस्स हो चूका था तो उसने मित्र मण्डली को फ्लाइट की पूरी जानकारी भेजी। वज्र का उसे फ़ोन आया और उसने गाड़ी भेजने की बात कही और फ़ोन रख दिया।
कल वैदेही " वज्र एक्सपोर्ट हाउस " से जुड़ने वाली थी और विभा का कल महिला युगल चयन स्पर्धा का पहला मैच था। वज्र भी वैदेही के यहाँ ही आनेवाला था। साथ में आबा भी जानकी जी मिलने आनेवाले थे।
शाम के पांच बजे सभी वैदेही के यहाँ पहुँच गएं! मैच शाम साथ बजे था और यश चार बजे पहुँचने वाला था। वज्र ड्राइवर के साथ पहले तो यश को लेने जानेवाला था और बाद में वैदेही और यश को लेकर विभा को चियर कर उसका हौसला बढाने के लिए पहुँचनेवाले थे थाने बैडमिंटन कोर्ट हॉल में।
सभी तय समय पर हुआ! वज्र ने यश को फूलमाला पहना कर यश का स्वागत किया और जल्दी-जल्दी यश और वैदेही को लेकर थाने के बैडमिंटन कोर्ट पर पहुँच गएं विभा का मैच दिखने तथा उसकी जोड़ी का उत्साहवर्धन करने निकल पड़े! आबा जानकी जी के यहाँ रुके थे उनसे बाते करने और कल सासवड़ जाने के बारे में बताने।
कल आबा के पिताजी की तबियत अचानक बिगड़ गई थी। रात को ही उन्हें पुणे के हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा था क्योंकि डॉक्टर ने मुम्बई तक ले जाने का खतरा लेना इस समय उचित नहीं समझा! आबा पहले पूना जाकर फिर सासवड़ जानेवाले थे।
विनायक राव जी के पिता ने तो वज्र से मिलने की इच्छा जताई थी लेकिन आबा ने इस समय वज्र को लेकर जाना उचित नहीं समझा क्योंकि अगर कुछ ऊंच-नीच हो जाता तो पिताजी को इलाज के लिए मुम्बई लाना पड़ सकता था और ज्यादा उत्तेजना भरें पलों से आबा वज्र को दूर रखना चाहते थे। यहीं वजह थी कि आबा जानकी जी को उसका ध्यान रखने की जिम्मेदारी सौंपना चाहते थे अपने आने तक और निश्चिंत हो कर जाना चाहते थे।
जानकी जी ने आबा को दिलासा दिया और वज्र की बिल्कुल चिंता न करने की हिदायत दी। जानकी जी को उत्तरदायित्व सौंपने का मतलब था निश्चिंत हो कर जाना। जानकी जी थी ही इतनी काम के प्रति समर्पित! आबा का भरोसा यूँही नहीं था उस पर! बहुत कठिन परिस्थितियों में वह उसे आजमा चुके थे। उसने आबा को कहा, " कुछ भी काम हो और भी तो बेझिझक कहना आबा! विश्वास आहे... आबा! पोरी ला परकं समजणार नाही तुम्हीं!"
हाँ में सिर हिला कर आबा मन ही मन मानों कह रहे हो, " पोरी! ओळखत नाही का ग तुला?" आबा टी वी देखने लगे और जानकी जी भोजन बनाने चली गई रसोईघर में।
आज जानकी जी ने पूरा महाराष्ट्रीयन खाना बनाया था। 'गरमा-गरम पीठलं और ज्वारी की भाकरी, साथ में मिर्ची का ठेचा, नारियल-लहसुन की चटनी!'
रात के नौ बज गए थे। जानकी जी ने पूरा खाना बना लिया था ताकि सब साथ-साथ भोजन कर सकें। वह दिवाणखाने में आ कर बैठ गई थी और और खबरें सुनने लगी। आबा ने फ़ोन करने के लिए मोबाइल हाथ में उठाया ही था कि यश और विभा की हँसने की आवाज़ सुनाई दी और आबा का अनुभवी मन लिफाफ़ा खोले बगैर ही मजनून भाँप गया। वो समझ गए की विभा ने मैच जीत लिया है और वैदेही ज्वाइन कर चुकी है 'वज्र एक्सपोर्ट हाउस'
जानकी जी ने देहरी पर जल रहे दिए मैं तेल उंडेला। रात भी झाँक-झाँक कर देखने लगी। बहुत दिनों बाद आँगन में युवा ब्रिगेड के कहकहें सुनाई दे रहे थे। सितारें जगमगा रहे थे आसमान में और मित्र-मण्डली के प्रारब्ध में भी।
कभी-कभी इन्सान गच्चा खा जाता है प्रकृति के जलवे
देख कर!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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