ये प्यार ही तो ज़िन्दगी...भाग ३९
भाग ३९

पूनम की चांदनी में रजनी नहा रही हो, आसमान में तारे छुपा-छुपी खेल रहे हो, कुछ ग्रह-नक्षत्र चुपके-चुपके निशा को निहार रहे हो, खुशनुमा बयार नागिन सी बलखाती लटों को छेड़ रही हो और चंचल मन का गुल्लक खुशियों से भरा हो तो ऐसे लगता हैं मानों समय तेज रफ़्तार  चेतक सा दौड़ रहा है। अंतर्मन में भाव उमड़ते हैं, काश! समय यहीं रुक जाता और हम एक कुशल फोटोग्राफर की तरह इन हसीन पलों को कैद कर लेते! 
पास के ही घर में टीवी पर भूले-बिसरे गीत बज रहे थे ...
"दुःख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे...
रंग जीवन में नया, लायो रे.."
गीतों के बोल सा ही हाल था वज्र, वैदेही, विभा और यश का! कई दिनों के बाद उनके जीवन में खुशियों की बहार आई थी, कारण भले ही अलग-अलग थे। प्यासी धरती पर पड़ी पहली बारिश की बूंदों सी वह उनके जीवन में नवांकुरों का सृजन कर रही थी, उनके जीवन-बगिया को सुरभित कर रही थी। 

दो दिन के बाद विनय के माता-पिता आने वाले थे कॉलेज के वार्षिक उत्सव में भाग लेने के लिए। उन्हें 'इंडो-नेपाल सांस्कृतिक समिति' के कार्यक्रम में शिरकत करने  तथा संस्था द्वारा उन्हें सम्मानित करने के लिए आयोजित समारोह में उपस्थित रहने का निमंत्रण दिया गया था।
वैदेही अपनी आर्थिक समस्या को सुलझाने के साथ-साथ वज्र, यश, विभा के साथ नुक्कड़ नाटक के सफल मंचन की भी जी-जान से तैयारी कर रही थी ! विभा और यश इसमें पूरा जोर लगा रहे थे हर स्तर पर! नाटक के पात्र के पहनावे, वेशभूषा, गेटअप, मेकअप से लेकर हर छोटी-छोटी बात पर वो बारीकी से विचार कर रहे थे! इतने दिनों के लम्बे, कठिन दौर से गुजरने के बाद यह पहला मौका था उन्हें खुद को शाबित करने का, खुद को स्थापित करने का! विषय भी जटिल लेकिन नया था और उसे रोचक, मनोरंजक तथा प्रभावी तरीके से प्रस्तुत कर आम श्रोताओं को एक सन्देश भी देना था! यह सब उस नुक्कड़ नाटक की सफलता पर ही निर्भर था! मित्र मण्डली को अपनी खोई हुई साख को पुन:अर्जित करना था! 
आबा ने इंडो-नेपाल सांस्कृतिक एसोसिएशन के ट्रस्टी के तौर पर विभा, यश के माता पिता, वैदेही की माँ को भी सम्मान समारोह में आमंत्रित किया था!  यश के पिताजी व्यापार के सिलसिले में न्यूयार्क गये हुए थे इसलिए सिर्फ यश की माँ ही आनेवाली थी और विभा के माता-पिता दोनों ही कल तक मुम्बई पहुँच रहे थे। वैदेही की माँ को आबा स्वत: व्यक्तिगत रुप से आमंत्रित कर चुके थे!
विभा के माता-पिता अपने प्रस्तावित अस्पताल के काम के लिए आनेवाले ही थे तो उन्होंने दोनों मौकों का ताल- मेल बैठा दिया था! ! आबा ने प्रतिभा जी को भी बुलाया था दो दिन के लिए! माता-पिता को तो वह चाह कर भी बुला नहीं सकते थे क्योंकि वो स्वयं सब की आवभगत में व्यस्त रहनेवाले थे लेकिन वज्र को जी-जान से चाहने वाले  दादा-दादी का कोई भरोसा नहीं था कब वह प्रतिभा जी के पहले ही गाड़ी में बैठ जाएं और मुम्बई आने के लिए तैयार हो जाएं! तब प्रतिभा जी के पास उन्हें साथ लाने के सिवा और क्या रास्ता बचता? यह तो सर्व विदित था कि वज्र उनकी दुखती नस था, हैं और रहेगा! 

विनय के माता-पिता से सारा मित्र-परिवार मिलना चाहता था! यह अभिभावकों का वह समूह था जो अपने बच्चों की जब यमराज से जंग चल थी तब एक-दूसरे का हाथ थाम कर अद्भुत जीवट के साथ, साथ-साथ खड़े थे, डट कर, एक-दूजे का सहारा बन कर, हर तरह से, हर स्तर पर समर्पित हो कर!

दुःख की घड़ियाँ कितनी लम्बी लगती हैं न? मानों युगों- युगों से चल रहा अंतहीन संघर्ष! ईश्वर की अकल्पनीय परीक्षा का लम्बा दौर! कब कोहरा छूँ-मंतर होगा और कब सूरज के दर्शन होंगे क्या पता! ऐसे मुश्किल दौर में 'डूबते को तिनके का सहारा' दे कर आगे बढ़ना क्या आसान  काम था ? 

आबा कैसे भूल सकते थे उन्हें जिन्होंने उनके कुल के दीपक की फड़फड़ाती लौ को अपने स्नेह-नेह से जलाएं रक्खा, अपनी सूझ-बुझ से, गिलहरी के नन्हें लेकिन महत्वपूर्ण योगदान से!

आबा इस 'मौके पर चौका' मारना चाहते थे, अपने कृतज्ञता भाव को दिल की गहराईयों से व्यक्त करना चाहते थे। उन्होंने सभी वरिष्ठजनों के लिए, अपने मित्र परिवार के लिए 'मुम्बई दर्शन' करवाने हेतु 'ट्रैवलर' गाड़ी बुक कर दी थी। सब की रहने-खाने-पीने की व्यवस्था भी एक ही हॉटेल में कर दी थी ताकि सभी कुछ समय के लिए अपने उत्तरदायित्वों को सिरहाने रख कर, खुल कर कार्यक्रम का आनन्द ले सकें! 

मित्र-मण्डली भी महाविद्यालय के वार्षिक उत्सव में छा जाना चाहती थी! वैसे तो उन्होंने सिर्फ पढ़ाई में ही नहीं बल्कि खेलकूद, साहित्यिक और सांस्कृतिक क्रिया-कलापों में भी अपनी सक्रियता और निपुणता का लोहा मनवाया था। मित्र-मंडली उसी जज्बे को जारी रख कर आगे बढ़ना चाहती थी!
नितीन सर से मिलने के बाद वज्र और वैदेही से यश और विभा की फोन पर जरूर बात हुई थी लेकिन उनकी आमने-सामने मुलाक़ात आज ही हो रही थी, कॉलेज के गुलमोहर तले! आज उन्हें नुक्कड़ नाटक की रिहर्सल की अंतिम तैयारी करनी थी। 
सभी दोपहर तीन बजे वज्र के यहाँ आने वाले थे! वज्र का घर बड़ा था और घर में नौकर-चाकर भी थे तो काम का बोझ परिजनों पर कम पड़ता था। विभा का मानना था कि वज्र के घर पर प्रैक्टिस बिना व्यवधान से और पूरी गोपनीयता से हो जाएगी और सभी ने उसकी अनुमोदना भी की!

जब से नितीन सर ने यश के लख़नऊ अकादमी में ट्रेनिंग की बात कही, विभा न जाने क्यों विचलित हो गई थी। यश के सानिध्य की मानों उसे ही नहीं पूरी मित्र-मण्डली को आदत सी हो गई थी! यश दोस्ती के आँगन का मानों सुरभित खुशनुमा हवा का झोंका था! उसके आते ही सारा माहौल कहकहों से गूंज उठता था! चिंता-तनाव के अणु-रेणु वातावरण से लुप्त हो जाते थे और सारी फ़िजा महक उठती थी...चंपा-चमेली की मादक खुशबू से!  उसके कदम पड़ते ही सब के अंदर छुपा बच्चा मानों जिन्दा हो जाता था ... ऐसे लगता मानों वसंत की दस्तक पा कर सारा आसमन्त पुलकित हो उठा हो! एक तरफ भविष्य का सुनहरा मंजर तो दूसरी तरफ दोस्तों से दूरियाँ! 
कभी-कभी आँसू भी भूल-भुलैया बन छलते हैं! पल भर खुशियों का औरा और अगले ही पल गमों का अँधियारा! एक तरफ भविष्य के सपने तो दूसरी तरफ मीलों दूर बिछड़े अपने! एक तरफ नियति का खेला तो दूसरी तरफ  अगम्य संभावनाओं का मेला! 
विभा अपने लक्ष्य पर अटल थी बिल्कुल यश की ही तरह! खेल खेल नहीं हौसलों का एवरेस्ट बन गया था दोनों के लिए जिसे सर करना ही उनका अंतिम लक्ष्य था!

लक्ष्य-प्राप्ति की बलिवेदी चाहती हैं सही दिशा में प्रयास, अटूट समर्पण, अद्भुत ज़िद, अगम्य जीवट, निरन्तर जद्दोजहद, वज्र सा जिगरा, अक्षय लगन और अटल आत्मविश्वास! 
स्वप्न-पूर्ति हेतु, कामयाबी के झंडे गाड़ने के लिए इतना दमखम, भागीरथ प्रयास तो चाहिए न? 
विभा जानती थी, समझती भी थी लेकिन यह दिल था कि मानता ही नहीं था! वैसे भी दिल की आवाज़ कहाँ सुनता-समझता हैं दिमाग़? 
वह कभी कठोर श्रीफल सा व्यवहार करती तो कभी मीठे नारियल पानी सा ! खुद वह समझ नहीं पा रही थी उसे  हो क्या रहा हैं, क्यों हो रहा हैं?
तीन बजने का क्यों इंतज़ार करना है भई? जाना तो जिगरी दोस्त के घर! सब के सब समय से पहले हाजिर!  एक-दूजे से मिले बिना, बतियाएं बिना मन कहाँ लगता था उनका! चारों एक-दूसरे के गले मिले, यश और विभा को तहेदिल से बधाई दी और चल पड़े वज्र के कमरे की तरफ! 
विभा ने सबको अपने-अपने डायलॉग बोलने को कहा! कहीं उच्चारण में सुधार की जरुरत थी तो कहीं विराम की लेकिन सभी ने अपने संवाद आत्मसात कर लिए थे! विभा ने सबको अपने-अपने कपड़े, अलंकार, जूते, नकली केश, वेशभूषा, लाठी, डमरु तथा अलग-अलग परिधान सब के पैकेट बनाने के लिए कहा ताकि ऐन वक़्त पर गड़बड़ न हो! मेकअप के लिए कोई अलग व्यवस्था नहीं थी बल्कि वहीं एक-दूजे की साज-सज्जा का ध्यान रखने वाले थे। सारा सामान साथ में मंच तक लाने की जिम्मेदारी विभा ने अपने माथे ले ली थी!
सबने अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से जरुरी दवाईयाँ, पानी की बोतलें  और थोड़े ड्राय-फ्रूट्स भी साथ लेने की तैयारी कर दी थी! सभी आत्मविश्वास से लबालब थे मानों भरा-पूरा मीठा जलकूप!
तपती दोपहरी का सूरज अब मोतीचूर का लड्डू लग रहा था और धीरे-धीरे आसमान धुंधला रहा था! गाय-बैलों के गले की घंटीयां बज रही थी और धूल के बादलों को पीछे धकेल कर आगे बढ़ रही थी! परिंदे पँख फैला कर अपने घरौंदे की ऒर लौट रहे थे और सबके पेट में चूहें धमा-चौकड़ी मचाने लगे थे! 
तभी अन्नपूर्णा भेल और रगड़ा-पैटिस के बाउल्स ट्रे मे सजा कर ले आई! छोटू अपनी दीदी की मदद कर रहा था! उसने कांच के ग्लास में पानी उंडेला और पानी का जग भर कर पास के टेबल पर रख दिया। सभी मजे ले रहे थे नाश्ते का तीखी-मीठी चटनी के साथ तभी आबा भी आ गएँ! 
बच्चों के चेहरे पर आनन्द की अद्भुत आभा देख उनका दिल बाग-बाग हो गया! उन्होंने सबका प्रणाम स्वीकार किया और वो अपने कमरे की तरफ चले गएँ कपडे बदलने और पीछे-पीछे छोटू भी उनके लिए पानी लेकर चला गया! अन्नपूर्णा रसोईघर में पैटिस की प्लेट बनाने में व्यस्त हो गई और मित्र-मण्डली उसका लुत्फ़ लेने में!

सभी नितीन सर की यश और विभा की खेल-प्रतिभा को तराशने की कोशिश से बहुत खुश थे! वो जानते थे यें दोनों खिलाडी देश का नाम रोशन करने की क्षमता रखते हैं! परिवर्तन, मिलना-बिछड़ना तो सृष्टि का नियम हैं... उसके डर से भविष्य की टोह लेना, लक्ष्य का संधान करने का प्रण कैसे छोड़ दे?

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
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