भूषण छन्द:
बिरयानी का स्वाद गजब, है 'मुनीर' कपटी अजगर।
दे दो 'नोबल' यह मक़सद, नाम खुदा का अब ले कर।
रहता चंदन वृक्ष लिपट, विषधर करता बुरे करम।
महाशक्ति का रहम-करम, भड़का शोले, न्योते यम।
आतंकी-जेहादी अब, खेल रहे हैं आंगन सब।
दुश्मन मालामाल बहुत, रोटी के हैं लाले तब।।
मुँह पर मिट्ठू मियाँ गजब, अब करते वार पीठ पर।
सात पीढियाँ बने सबल, वतन-आन सब कुछ तज कर।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।