माँ! स्वीकार कर लो..

माँ! क्यों नहीं छोड़ आई घने जंगल में...

अपाहिज बेटी को हिंसक पशुओं के बीच में?
क्यों लड़ती रही मंथराओं,शकुनियों,स्वजनों से?
जिन्दा रखने अंश को पत्थर दिलों की बस्ती में?
 
माँ! कितनी बार जख़्मी हुए पर,
सपनों के नभ में परिंदे सी उड़ान भरने पर!
अपने-परायों के सहे, तानों के नश्तर!
चुभो गएँ सगे-सम्बन्धी नित सीने में खंजर!
 
माँ! कितनी मुश्किल थी परवरिश,
दिव्यांग बेटी की इस बेरहम दुनिया में!
अरमानों को स्वाहा कर जीने में,
कर्म यज्ञ में समिधा बन स्व की आहुति देने में!
 
माँ! धुन की पक्की..बहुत जिद्दी हो न आप? 
न मन से हारी न कभी दुनिया से बार-बार!
मेहनत, प्रशिक्षण, लगन के बल पर,
जंग छेड़ी खेल-खेल में, हौसले के दम पर!
 
माँ! अब तो स्वीकार कर लो...
 
दिव्यांग बेटी का अनमोल उपहार!
जीवट, जद्दोजहद, जिजीविषा से सजा अलंकार!
 
ममता के पलने में झूलता आत्मविश्वास!
रंग लाई है मेहनत, गिलहरी का प्रयास!
 
मेडलों की बारिश, दिव्यांगों का दमखम, 
पैरिस पैरालिंपिक खेलों में लहराता परचम!
 
जन गण मन... संग आरोहण करता तिरंगा!
हिम सी पिघलती सोच, कल-कल बहती गंगा!
 
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र 
 
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