भाग ७८
शाम होते-होते आजी के दो बार फ़ोन आ गएं थे। वज्र ने विभा और यश को भी खाने के लिए रुकने को कहा लेकिन उन्हें प्रैक्टिस के किए जाना था। यश ने विभा को उसके लैपटॉप में अकाउंटिंग के लिए 'झोहो' (Zoho) सॉफ्टवेयर डाल कर दे दिया था। अब विभा के लिए अप्पा का हॉस्पिटल का हिसाब-किताब सँभालना आसान हो गया था। वैदेही ने कराड से लौटेते वक़्त ही कुछ 'एक्सेल शीट' बना कर दे दिए थे जिसमें दानदाताओं की पूरी जानकारी दर्ज करना आसान हो गया था।
यश ने आज एक बार फिर विभा को समझाया। यश बोल रहा था और विभा सुन रही थी। "हर एक के शरीर की भी अपनी एक क्षमता होती हैं। वह सबका बोझ अपने सिर लेकर सीधे नहीं चल सकती। मन में उठते हर क्यों का जवाब देना कभी-कभी संभव नहीं होता और हर बार अपनी बात को लेकर अड़ियल रुख अपनाना भी सही नहीं होता। बहुत बार हम सही होने के बावजूद भी हमें गाड़ी को पीछे की ऒर ले जा कर आगे बढ़ना पड़ता हैं। बेशक़ हम सही होते हैं लेकिन वक़्त अगर अपने अनुरूप न हो तो चुप बैठ कर अपने वक़्त का इंतज़ार करना चाहिए और जब शटल अपनी कक्षा में आएं तभी उसे पूरे दमखम से मारना चाहिए यह सादा, सरल नियम कैसे भूल गई विभा तुम?
तुमने डॉक्टर का स्टेथोस्कोप देखा हैं विभा ? जब भी हम उस पर जोर देते हैं वह दब जाता हैं पर जैसे ही जोर हटा, वजन हटा वह पूर्व स्थिति में फिर उसी जगह आ कर ठहर जाता हैं। विभा! तुम्हारी सच्चाई, संवेदनशीलता पर किसी को शक नहीं मगर उसका विपरीत असर अगर तुम्हारे स्वास्थ्य पर होने लगे, तुम्हारे लक्ष्य को पाने की कोशिशों पर नकारात्मस्क प्रभाव पडने लगे तो फिर चिंता तो होगी न!
विभा! चिन्ता इन्सान को निगल लेती है अजगर सा और विडम्बना है प्रकृति की कि ये अजगर पनाह भी लेते हैं तो चन्दन के विशाल वृक्ष की ।
विभा! आखरी बार कह रहा हूँ! अगर ईश्वर ने हमें उस भयानक दुर्घटना से बचाया हैं तो उसका जरूर कुछ न कुछ बड़ा अर्थपूर्ण उद्देश होगा। अपने आप को स्थिर रक्खो!"
"विभा! सो तो नहीं रही हो मेरी ब्यूटी क्वीन? मैं बक-बक कर रहा हूँ और तुम उलटे घड़े पर पानी समझ कर मुस्कुरा रही हो? "
इस बार सचमुच विभा कहकहें लगाने लगी। "यार यश! तू 'सीरियस मोड़' में बिल्कुल अच्छा नहीं लगता" और यश भी बोल पड़ा, "और तू इस रोनी सूरत में" और दोनों खिलखिला कर हँसने लगे।
आज प्रैक्टिस मैच में दोनों ने अपने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया था। यश मन ही मन मुस्कुरा रहा था, "इस पगली के मस्तिष्क की 'एंड्राइड बैटरी' को बार-बार चार्ज करना पड़ता है यार! छोटी सी गुड़िया सा समझाना पड़ता हैं इसे"
लाली को विभा सुबह ही वज्र के यहाँ छोड़ आई थी। आजी की अनुभवी नज़र ने वहीं बात को पकड़ लिया था। विभा ने हँसते-हँसते कहा आजी को, " आजी! यहाँ छोटू हैं, अन्नपूर्णा हैं तो इसका मन लग जाता है। लड़की की जात! वहाँ कहाँ अकेला छोड़ आऊ उसे?"
लाली आजी के सवालों से बच कर रसोई में चली गई थी और विभा आजी के पास बैठ कर सासवड के बारे में बातें करने लगी। उसने आजी को कराड आने का न्योता दिया। उन्होंने भी कृष्णामाई के दर्शन की इच्छा जताई और साथ ले जाने को कहा। आजी ने अप्पा के बारे में पूछा और उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। उनका भूमिपूजन का कार्यक्रम कैसा रहा यह भी पूछा तो विभा ने उन्हें अल्बम ला कर दिखाने का वादा किया।
आजी ने फिर एक बार पद्मावती जी और यशवंत राव जी की स्तुति की और भगवान उन्हें और अच्छे काम करने की शक्ति दे...ऐसी प्रार्थना भी की। विभा अभिभूत थी। अनुभव की भट्टी में आजी की सोच कितनी तप कर परिपक्व हो चुकी थी यह देख कर वह अचंभित थी।
विभा को अब खेल और पढ़ाई पर ध्यान देना जरुरी था। लाली के लिए उसे एक-दो दिन में हॉस्पिटल जाना था। समय उनके पास कम था और जिम्मेदारियाँ ज्यादा! सभी जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभाना भी था। मित्र- मण्डली एक-दूजे को मदद कर रही थीं और भार को हल्का करने की कोशिश कर रही थी।
बिन-बुलाएं मेहमान सी चुनौतियाँ उनके सामने बाहें फैलाएं आकार खड़ी होगी और उन्हें फ़ौलादी हौसले से उनका सामना करना पड़ेगा यह तो वह जान चुके थे और इसी लिए वो अंतिम समय का इंतजार नहीं कर रहे थे बल्कि समय से पहले ही चुनौतियों को चुनौती दे रहे थे।
जीवन के इतने कटु अनुभवों ने उन्हें ज़िन्दगी जीने का पाठ तो पढ़ा ही दिया था।
बैडमिंटन खेल कर विभा आई लाली को लेने तो विभा ने देखा कि लाली छोटू, आजी, अन्नपूर्णा में घुलमिल गई थीं। उसकी मासूमियत मुखर हो कर बोल रही थी। अन्नपूर्णा उसे छोटी-छोटी बातें सीखा रही थी और छोटू.. लाली को अपलक निहार रहा था।
छोटू बारहवी की परीक्षा दे रहा था। रोज का काम कर रात को वह परीक्षा की तैयारी करता, अपनी दीदी को काम में मदद करता, रात की स्कूल में पढ़ने जाता। उसकी जीवट देख लाली अचंभित थी। वैसे लाली गाँव की खुली हवा में पली-बढ़ी थी। वहाँ के पानी में सादगी और सरलता थी। उसकी और लाली की दोस्ती जम गई थी। वह उसकी किताबों को टटोलती, पढ़ने की कोशिश करती, जो नहीं आता वह छोटू से पूछती। उसके साथ हुए हादसे को वह भूलने की कोशिश कर रही थी और छोटू और अन्नपूर्णा उसमें मददगार साबित हो रहे थे।
विभा लाली को लेकर जाने लगी तो आजी ने उन्हें खाना खा कर जाने को कहा लेकिन विभा काम का बहाना बना कर निकल गई। घर में सारा काम यूँही पड़ा था। दो-चार दिन की बात थी। वह जल्दी-जल्दी घर की तरफ बढ़ी। लाली को भी मदद की जरुरत थी। दोनों ने मिल कर काम निपट लिया। तभी डॉक्टर का फ़ोन आया। उन्होंने परसों लाली को शाम सात बजे क्लिनिक में लेकर आने को कहा। सुबह के बाद कुछ भी खाने के लिए लाली को मना किया गया था। लाली को छ: घण्टे खाली पेट रहना था।
विभा के मन से थोड़ा भार उतर चूका था। आबा कल रात तक पहुँचने वाले थे। लाली को भी कुछ कमजोरी आ गई थी। ! उसे डर लग रहा था कहीं आबा माँ को साथ न ले आएं। मन में माँ का डर और ऊपर से छोटी उम्र!
लाली चक्रव्यूह में प्रवेश तो कर चुकी थींl बिना सोचे-समझें और अब बाहर निकलने को तड़प रही थी। वक़्त के साथ-साथ उसे अपनी मूर्खता का एहसास हो रहा था लेकिन अब क्या फायदा जब चिड़िया चुग गई खेत! वह चक्रव्यूह में घुस तो चुकी थी पर उस दमघोंटू गुफ़ा से, चक्रव्यूह से बाहर निकलने का रास्ता उसे कहाँ पता था?
अप्पा से अभी तक उसका पाला नहीं पड़ा था लेकिन विभा उनके गुस्से को बखूबी पहचानती थी। पैसे की तकलीफ, अनियमितता वो सह सकते थे लेकिन इज्जत की... कदापि नहीं! इसीलिए उन्होंने एडी-चोटी का जोर लगा दिया था मामले को सही तरीके से निपटाने के लिए!
परसों डॉक्टर के यहाँ कौन-कौन जायेगा यह अप्पा आकर ही निश्चित करनेवाले थे। दोनों के लिए अप्पा के इंतजार की रात बहुत भारी पड़ने वाली थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। शंकाओं का बवंडर विभा के मन उठ गया! इस वक़्त, बिना फ़ोन किए कौन हो सकता हैं? उसने खिड़की का पर्दा हटा कर देखा.. बाहर अप्पा खड़े थे।
विभा ने दरवाजा खोला। अप्पा सीधे अंदर चले आएं। विभा और लाली ने उन्हें प्रणाम किया तभी अप्पा ने लाली को चाय बनाने को कहा और वह शान्ति से सोफा पर बैठ गए! न किसी को कुछ पूछा न किसी को कुछ बोला!
विभा जानती थी यह तूफान के आने के पहले की शान्ति है। किनारे पर खड़े रह कर समंदर की गहराईयों में चल रही उथल-पुथल का अंदाजा लेना मुश्किल था...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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