चौपाई... हनुमत!

अंजनेय सुत अति बलशाली।
रूद्र रूप धर कर रखवाली।।
पिता केसरी वानर राजा।
राम भक्त हे हनुमत आ जा।।१।।

कृपा दृष्टि प्रभु की अति भारी।
दीन-दुखी की पीड़ा हारी।।
राम नाम का जाप जपे नित।
पावे सेवा कर के समकित।।२।।

मात सिया को खोजे हनुमत।
देख दशा माँ की कपि आहत।।
व्याकुल सीता आशा झूठी।
देख सियावर की अंगूठी।।३।।

अरि-खल नायक राक्षस भारी।
मुक्त करेंगे रघुवर प्यारी।।
माया-छाया-भ्रम दुखियारी।
आशंका सिय मन में जारी।।४।।

फूँक दशानन कंचन क्यारी।
स्वाहा रावण लंका न्यारी।।
चले राम को हनुमत लेने।
भव सागर से नैया खेने।।५।।

ग्रास सूर्य को चला बनाने।
कपि सुवर्ण लंका को ढ़ाने।।
सेतु पार कर दशरथ नन्दन।
करें पराजित अधम दशानन।।६।।

लाकर औषधि कपि दी लछमन
विपदा टाली रघुवर प्रियजन।।
पवन पुत्र बहु मंगल कारी। 
महाबली खल कुल संहारी।।७।।

राम भक्त तुम वानर हनुमत।
बुद्धि ज्ञान के आगे सब नत।।
शक्ति-भक्ति की अदभुत गाथा।
आंजनेय नतमस्तक माथा।।८।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं