कुंवर! भंवर की चमकती आँखों में देखकर मांगी लाज से पानी-पानी हो गई! दूध से भरा नक्काशीदार गिलास भंवर को थमा कर वह द्वार की तरफ चल पड़ी! ताजे गोबर से दीवार-आँगन लिप-पोत कर रंगोली, माण्डना से घर को सजाना था उसे! सूरज की सुनहरी किरणे द्वार पर दस्तक दे रही थी!
आज मांगी के पैर ही जमीं पर नहीं थे! बावरी हो गई थी वो बेटे के इंतज़ार में! रात भर नींद को उसने आसपास फटकने ही नहीं दिया था! कभी सोचती.. कुँवर की पसंद का गुड़ का हलवा ही बना देती हूँ...तो कभी सोचती खीर ही बना देती हूँ! फिर यक्ष प्रश्न... रंगोली कैसे बनाऊं? गेंदे या गुलाब की पंखुड़ियों से! नहीं..नहीं.. माण्डना बना देती हूँ..कुंकुम से लछमी जी के पगलियाँ बनाऊंगी देहरी पर...अबकी बार सात फेरे लिए बिना जाने ही नहीं दूंगी कुँवर को..सीमा पर... 

मन के परिंदे पल में सीमावर्ती इलाकों में पहुँच जाते..रेत की वावर आते ही फिर लौट आते तपती धरा के इर्द-गिर्द...पोखर-ताल ढूंढने!

द्वार के दोनों तरफ फूल-पत्तों के बिच मोर तो बना ही चुकी थी वह एक सुलझे हुए कलाकार की तरह..
अब रंगोली में गेंदे की पंखुड़ियों से केसरिया रंग भर रही थी!
तभी ढ़ोल नगाड़ो की आवाजें, लोग- लुगाइयाँ, बच्चों की किलकारियां सुनाई देने लगी! 
मांगी ने पगदंड़ी की तरफ नज़र दौड़ाई... यह तो कुँवर हैं मेरा... सेना की वर्दी में.. उई माँ! सीने पर इतने तमगे..दोस्त कंधों पर उठा कर नाच रहे हैं.. जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं... वह मन्त्रमुग्ध हो निहारने लगी..
 
"कुँवर... मेरा लाल! क्या बात हैं? माँ को देख दौड़ कर नहीं आया... नाराज़ हैं बेटा? दौड़कर नहीं आया तू माँ को प्रणाम करने.. गले मिलने? और यह व्हीलचेअर ... इसमें बैठ कर क्यों आ रहा हैं मेरा लाल? " 

उसके हाथ के कलश से बिखरी जल-बुँदे चमक रही थी रंगोली में सजी पंखुड़ियों पर... मानों माँ के आँसू मुस्कुरा रहे हो अपने लाल की कुर्बानी पर...वतन के लिए कुर्बानी दे आया था उसका लाडला...
उसने कुंकुम तिलक कर बेटे की आरती उतारी और व्हीलचेअर को पकड़ वह द्वार की ओर आगे बढ़ने लगी....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|



इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कहानी! आगे जे वहाग का इंतज़ार रहेगा!🙏❤️🙏❤️🙏❤️🙏
  • आप चमकते रहें और बढ़ते रहें