'शिक्षक दिवस' पर भाव-सुमन अर्पित हैं मेरे जीवन शिल्पकारों को!
वक़्त के चक्के पर दे आकार,
मिट्टी के गोले का सृजनकार,
उज्जवल भविष्य का रच्चणहार,
जीवन-नैया का खेवनहार!
हीरे का पारखी, जौहरी होनहार,
तराशने में माहिर, शिल्पकार !
अंधियारी रातों की दीपशिखा
शुभ आरम्भ तू, तू मित्र, सखा।
भटके पथिक का साथी-साया!
सरवर में खिला पंकज मन भाया!
अंतरात्मा के स्पंदन का आर्तनाद,
अभिभावक त्याग-प्यार निर्विवाद!
जीवन वीणा का कोमल साज,
राष्ट्र स्वाभिमान, राष्ट्र का नाज़!
भूत की धरोहर, भविष्य का निवेश!
आशीर्वाद की गठरी, उन्नत परिवेश?
शिक्षकगण, शिक्षाविद्, शिल्पकार,
निर्माता, निर्देशक, नव ज्ञान भंडार!!
मौलिक तथा स्वरचित,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई।