शीर्षक : प्रकृति:
भोर का पल्लू थामे, जिद पे अड़ा चंद्रमा!
कुहुँ-कुहुँ सुन मुस्कुराई, सूर्योदय की लालिमा!
छंटे नैराश्य के बादल, छा गई अरुणिमा!
प्रकृति खूब खिलखिलाई, भागी हठी कालिमा!
लहरों ने बजाया बिगुल, परिंदों ने की मंजिल फतह!
पंख फैला खग चले, बादलों से करने जिरह!
खुशनुमा बयारों ने छेड़ा, राग मधुमति
मालकंस!
झूमने लगे पेड़-पौधे, भ्रमर ढूंढें, पराग-मधु-अंश!
बहा ले जाए संग-संग, सूखे पेड़-पत्तों का कुनबा!
शुद्ध जलधारा ले आगे बढे, छोड़ मल-मैल, मिट्टी-मलबा!
खेत-खलिहान, उपवन-बागान, जल-जंगल-सौर-ऊर्जा-प्रकाश!
नीचे हरियाली धरा, ऊपर नीला-नीला आकाश!
कहीं सरसों-सूरजमुखी, कहीं गेंदा-पलाश!
खेत-खलिहानों को चीरती, नागीन सी पगदंडी!
कहीं झूमती बालियां, कहीं खड़ी बेंत की दंडी!
कहीं हिमशिखरों पर तैरती, बादलों की उड़नतश्तरीयां!
कहीं श्वेत चोटियों से झांकती, किरणों की टोलियां!
कहीं उतुंग फलक पर, वीरों के खून से सजी अल्पना!
कहीं अंतरिक्ष की गोद में अलविदा कहती 'कल्पना'!
वन-उपवन, शहर-सहर, जल-जंगल, पशु-पक्षी प्रकृति रुप!
जल-थल-आकाश में व्याप्त, सृष्टि तू! ब्रह्म स्वरुप!
रच्चनहारे का वरदान, जीव-अजीव,अणु- परमाणु तेरा संसार!
शेर, उल्लू, मयूर, मुषक, देव-दानव से पाएं प्यार!
पत्थरों को चीर मानव, बना रहा अपना आशियाना!
प्रकृति से न करो खिलवाड़, पर्यावरण से हो याराना!
कल-कल करें जलप्रपात, सुप्त प्रकृति, ऊठ करें गर्जना!
मूर्ख मानव से करे हर पल, नदी-नाले-पोखर अर्चना!
सृष्टि का श्रृंगार अनुपम, मां भगवती साक्षात रुप!
सृजन का सौंदर्य अद्भभुत, तू जीवट, जिजीविषा, जीवन प्रारुप!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र!