नमन माँ शारदे!
द्विगुणित सुंदर छंद:12 12: पदान्त: गुरु गुरु
गीत :
गढ़ा लक्ष्य पर आँखें, स्वप्न सींच पाऊँगी।
जीवट के बलबूते, जीत खींच लाऊंगी।।
आभूषण के जैसी, मूल्यवान तू भारी।
नित प्रयास जब होंगे, विद्यार्थी बन नारी।
कौन भला दे पाएं, मात तुझे करारी।
कर तूँ प्रयत्न सारे, देगा यश त्रिपुरारी।।
गोवर्धन सपनों का, मैं स्वयं उठाऊंगी।
जीवट के बलबूते, जीत खींच लाऊंगी।।
अंतरिक्ष की रानी, उड़नपरी पी टी सी।
पन्ना धाई त्यागी, मर्दानी झाँसी सी।
जननी तू देवों की, दुर्गा तू काली सी।
नारी तू जगदम्बा, तू मात भवानी सी।
उम्मीदों का दोना, भर-भर ले आऊंगी
जीवट के बलबूते, जीत खींच लाऊंगी।।
शिक्षा-दीक्षा तेरी, व्यर्थ नहीं जायेगी।
जन-गण की कर सेवा, तू सम्बल पायेगी।
नित्य सृष्टि की माता, आशीष दे आयेगी।
माथे पर तुम देखो, हाथ फेर गायेगी।।
गर्वान्वित हो ऐसा, पल मैं संजोऊंगी।
जीवट के बलबूते, जीत खींच लाऊंगी।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।