हे मूर्ख मानव! क्यों पाले है भ्रम?
सदियों से जारी यह क्रम!
नश्वर के पीछे भाग-दौड़,
शाश्वत से खड़ा मुँह मोड़!
जगतजेता सिकंदर,
गया दुनिया से खाली हाथ!
तू क्या उखाड़ ले जायेगा,
कल्पवृक्ष, रिश्ते-नाते साथ?
हे मूर्ख मानव!
क्यों गुमान स्वयं पर?
शाख से सूखा पत्ता न गिरे ,
रच्चणहारे की मर्जी बगैर!
कटी पतंग सा भटके दर-बदर
पता नहीं मंजिल हैं किधर!
कठपुतली तू, नचाएँ वहीं,
देख पाया न तू जिसे कहीं,
बसा सृष्टि के कण-कण में वहीं!
हे मूर्ख मानव!
क्यों फँसा भ्रमजाल में ?
मोह-माया के जंजाल में?
सगे-सम्बन्धी, साथी-नाती झूठे,
खड़ी अट्टालिका स्वार्थ के बलबुते!
प्रसिद्धि का नवनीत सब चखे,
अंधेरें में खुद का साया न दिखे!
उजालों में भ्रम का दरबार सजा,
जान पाया नहीं उसकी रज़ा!
हे मूर्ख मानव!
क्यों मोह के दलदल में फँसा?
क्लेश-क्रोध-कषाय-भंवर में धंसा!
पाप के दलदल में खिलते नहीं,
संसार-सरवर में पद्मकमल कहीं!
कर्मों का लेखा-जोखा भारी,
यमराज से निभानी पडती हैं यारी!
शुद्ध मन से करों प्रभु की भक्ति,
छुपी ब्रह्माण्ड में अपार सृजन शक्ति!
हे मूर्ख मानव! क्यों सजा रहा भ्रम का दरबार?
मोक्ष-मुक्ति-मार्ग पर सजता सिर्फ प्रभु दरबार!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।