ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ५४
भाग ५४

हवाई अड्डे पर विमान अपने निर्धारित समय पर पहुँच चूका था। सभी ने अपना सामान लिया और निकल पड़े अपनी कर्म भूमि की ऒर! पूर्णिमा की चांदनी कल ही अपना जलवा बिखेर चुकी थी। आज चन्द्रमा कुछ मद्दीम था मानों बीती रातों की यादों में खोया हुआ! सर्द हवाएं उलझी लटों को सुलाझा रही थी। प्राची भी अभी तारों को पल्लू से ढ़क कर सोई हुई थी। इक्का-दुक्का नटखट तारा पल्लू से मुँह बाहर कर अंगड़ाई ले रहा था। परिंदे भी डाल-डाल पर सुस्ताएँ हुए थे। झींगुरों की ध्वनि मंद पड चुकी थी! 

हवाई अड्डे पर अभी-अभी आई फ्लाइट की वजह से चहल-पहल और रौनक थी। सभी एयरपोर्ट से बाहर निकलने की कोशिश में लगे थे तभी आबा का कॉल आया। वज्र ने सब के पहुंचने की सूचना दी और सभी फुर्ती से निकल पड़े। 

बाहर गाड़ी चालक के साथ आबा भी खड़े थे मित्र मण्डली का स्वागत करने मानों जंग जीत आएं हो। आबा ने वैदेही को सुन्दर गुलाब की माला पहनाई और उसके चरण स्पर्श करते ही बोल पड़े, " शाबाश पोरी! शाबाश!" और सब गाड़ी की ऒर चल पड़े। जानकी जी थक गई थी। नींद बार-बार रूठ जाती थी। वह तेज चलने की कोशिश कर रही थी लेकिन वज्र ने उन्हें धीरे-धीरे चलने के लिए कहा। कभी-कभी जल्दबाजी की बड़ी कीमत चुकानी पडती हैं और अच्छे खासे माहौल को मानों नज़र लग जाती हैं।

सभी गाड़ी में बैठ कर निकल पड़े घर की ऒर।  सबको घर तक पहुंचा कर आबा अंत में घर लौटे थे वज्र के साथ। अनुभव की भट्टी में तप कर फौलाद बने आबा इस मामले में किसी का भरोसा नहीं करते थे। आधी रात का समय था। गलियाँ सूनी थी, ज्यादातर दरवाज़े बन्द थे। कैसे जोखिम उठाते और अकेली विभा को नीचे छोड़ जाते? उन्होंने यश के मामले में भी जोखिम नहीं उठाई। यश को भी घर के दरवाज़े तक छोड़ा और वैदेही और जानकी जी के घर में प्रवेश करने तक वो बाहर खड़े रहे और अंत में निकल पड़े अपने आशियाने की ऒर।

असल में वज्र को भी आराम की सख्त जरूरस्त थी। खुश तो बहुत था वह लेकिन शरीर तो शरीर हैं। जरुरत से ज्यादा भागदौड़ को सहने की स्थिति में वह अब भी नहीं था। पहले ही ध्यान रखना समझदारी थी और आबा ने वहीं किया। वज्र को कमरे में भेज दिया आराम करने के लिए और खुद चले गए चैन की नींद लेने!

भोर होने को एक प्रहर अभी बाकी था। उन्होंने कुछ समय आराम कर फिर पूजा-अर्चना करने का मन बना लिया था। रविवार होने की वजह से किसी को कोई जल्दी नहीं थी। सभी मन से ख़ुश थे तो निंदिया रानी ने भी आज नखरें नहीं दिखाए और वह भी चुपके से आ कर हौले से थपकियाँ देने लगी। 
विभा बहुत कोशिश कर रही थी लेकिन उसकी नींद ऐन वक़्त पर नखरें दिखाती समधन सी उचट गई थी। महत्वकांक्षा का बोझ हल्का तो था नहीं और उसमें यश से जुदाई का गम! विभा मन के ही बुने जाल में मकड़ी सी फंसी जा रही थी और बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नज़र नहीं आ रहा था। वह किंकर्तव्यविमुढ़ हो कर कुछ सोच रही थी कि सामने पड़ी डायरी पर उसकी नज़र पड़ी। यादों की गठरी को खोल वह कुछ लम्हों को फिर से जीने की कोशिश करने लगी। यादों का परिंदा उसके कन्धे पर बैठ कर उससे बतियाने लगा!
"हाय बोल्ड & ब्यूटीफुल! जरासी तपिश से पिघलने लगी मोम सी! अभी तो यह शुरुआत है! इतनी कमजोर तो कभी नहीं थी तुम! कम ऑन! लेटस मूव! अभी तो खुद से संघर्ष शुरू हुआ है! 
लक्ष्य को पाना है तो इरादा पक्का होना चाहिए मैडम ! भावनाओं के बवंडर में मंजिलों का पता क्यों भूल रही हो? 
लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करो! चलो! तैयार हो जाओ प्रैक्टिस के लिए!"

अवचेतन मन की धुडकियों से वह सजग हुई और उसने यश को फोन लगाया। यश ने झट से फोन उठाया मानों वह फोन का ही इंतज़ार कर रहा था! "क्या यार तू भी! न खुद सोती हैं न दूसरे को सोने देती हैं! अभी-अभी तो नींद लगी थी..." विभा बोल पड़ी, " क्या करुँ? मेरे सपने ही ऐसे हैं जो मुझें सोने नहीं देते! तेरा क्या! कुम्भकर्ण का वंशज तू! न उठाऊ न तो पूरा दिन सोता रहेगा! चल तैयार हो जा! उस वीणा को भी बुला कॉल कर के और नितीन सर को भी बता देना कि प्रैक्टिस के लिए हम जा रहे कॉलेज के बैडमिंटन कोर्ट पर!"
"बस! महारानी जी... बस! बन्दे से कितना काम करवाओगी?  बच्चे की जान लोगी क्या? "
दोनों दिल खोल कर हँसने लगे। विभा भी अब कुछ संभल गई थी। आखिर क्या रिश्ता था उसका?
उसे अपनी ही लिखी कविता की चंद पंक्तियाँ याद आने लगी... 

'रिश्ते जो आंखोमें सीप से पलते हैं ....
मोतियों से पुतलियों में चमकते हैं ....
बेजुबान सही, बहुत कुछ बोलते हैं ....
भरी दोपहरी में पैमाने से छलकते हैं।

रिश्ते जो काँटों पे खिलते हैं ...
चुभन सीने में छुपा हंसते हैं ....
जिंदादिली से चट्टानोंको निगलते हैं ...
मोम से प्यार की तपिश से पिघलते हैं।'

विभा मन ही मन मुस्कुराने लगी। क्या यश से ऐसा रिश्ता हैं जो उसके सशरीर साथ न होने पर टूट जायेगा? दिलों के तार जुड़े हुए हैं तो फिर किस बात की चिंता, किस लिए अवसाद! कितनी बावरी हूं मैं! यह कोई जिस्मानी रिश्ता तो हैं नहीं, मन का रिश्ता हैं जो खरे पानीदार मोतियों सा जहाँ कहीं भी हो, चमकता हैं, दिल में उजाला भर देता हैं! एक-दूसरे को हौसला देता हैं, जीवन की साँझ बेला में दीप बनकर अंधेरों को चुनौती दे कर दूर भगाता हैं।
उफ़नते दूध में ठन्डे पानी की दो-चार बूंदों ने मानों अपना कमाल दिखा दिया था! अदना सी चंद बूंदों के छिड़काव ने उबलते दूध की उत्तेजना, उफान को ठण्डा कर उसे शांत कर दिया था! विभा की सोच अब सभी अवरोधों को लाँघ कर सकारात्मकता की ऒर बढ़ चुकी थी!

विभा खुद को ही कोसने लगी! कैसे मैंने इस बेनामी रिश्ते को इतना कमजोर समझ लिया? यश के साथ इतने दिनों से रह कर भी मैं क्यों कुछ सीख नहीं पाई? उसकी हँसी न जाने कितना दर्द भीतर छुपाने की कोशिश करती हैं.. दोस्त हो कर क्यों नहीं समझ पाई मैं उसे?  क्या ऐसी मानसिक दृढ़ता से मैं तमगे जीत पाऊँगी देश के लिए? ऐसे खरी उतरूंगी मैं मित्र मण्डली की उम्मीदों पर? वैदेही ने ख़ामोशी से कछुए की भांति रेस जीत ली और मैं मैदान में उतरने के पहले ही हार मानने लग गई! धिक्कार हैं मुझ पर! 
तभी यश का फोन आया और विभा नीचे उतर आई! 'ओला' में बैठे यश को उसी का इंतज़ार था! एक तरफ परीक्षा की तैयारी और दूसरी तरफ खेल की प्रैक्टिस, दोनों में तालमेल बैठाना जरुरी था।

यश को परसो लखनऊ जाना था नितीन सर के साथ! टिकट बुक हो चुकी थी लेकिन प्रैक्टिस में अनियमितता आ गई थी। यश के लिए यह चयन बहुत ही जरुरी था! उसके अग्निपँख लगे सपनों की आधारशीला थी यह चयन प्रक्रिया। निरन्तर और अथक प्रयास और संतुलित आहार का कोई पर्याय नहीं था। उसके लिए खेल सिर्फ खेल नहीं उम्मीदों का नीला आसमान था! सामने लक्ष्य तो साफ़ था लेकिन अवरोधों की लंबी श्रुँखला थी! उन्हें पार करना मुश्किल जरूर था लेकिन नामुमकिन नहीं था सिर्फ जरुरत थी दृढ़ निश्चय और अथक भागीरथ प्रयासों की...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में..


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