रिश्ते, जो लब्जो में बयाँ होते हैं ,
दिल के आसपास कहीं होते हैं,
जरासी आँच से पिघलते हैं,
बर्फसे नीर बन फिसलते हैं,
कोहरे से धरा पें छाते हैं,
नई-नवेली किरणों को निगलते हैं,
दिल में शूल से चुभते हैं|
रिश्ते जो आँखों-आँखों में जवाँ होते हैं,
दिल के आँगन में मोगरे से महकते हैं,
सावन की फुहारों में भीगते हैं,
मिट्टी की नमीं लिए पलते हैं
साँस की धुन पे बहकते हैं ,
जिंदगी का ताज पहन इठलाते हैं,
दिल में बसंत ले आते हैं|
रिश्ते, जो दिल से दिल तक सफ़र करते हैं,
बेजुबान सही, बेखौफ हो पलते हैं,
अन्धेरोंमें जुगनुसे चमकते हैं,
आसमान को छूने का हौसला देते हैं,
वक्त को कैद कर मुट्ठी में,
दिल को दीवाना बना देते हैं!
जिंदगी तेरे बेतहाशा इश्क में,
मर-मर कर भी जीना सीखाते हैं|
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |