दिपांशी की नजर बार- बार दरवाजे और घड़ी की आवाज पर बारी बारी उठ रही थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जो उसने आने में इतनी देर लगा दी हो। फोन करके पूछूँ यह ख्याल भी आया लेकिन दूसरे ही क्षण वह गाड़ी चला रहा होगा यह सोचकर रूक जाती और दरवाजे की आहट लेने लगती।
कुछ क्षण बाद हरिश का फोन आया तो उसने बताया आज के दिन साहिल तेरे यहाँ नहीं आ सकता क्योंकि वह अभी अस्पताल में भर्ती है। यह शब्द सुन वह दौड़ी - दौड़ी अस्पताल पहुँची और उसे मिलकर कहने लगी, भाई तूने आजतक मेरी रक्षा की परंतु आज मेरी बारी है। इतना कहकर दिपांशी ने अपने भाई के प्रति बहन का फर्ज निभाया और उसे नया जीवन दिया।
यह दृश्य देख हरिश के मुख से भावुकतावश अनायास ही बोल फूट पड़े, काश! मेरी भी दिपांशी जैसी कोई बहन होती जो दु: ख में साथ देती। हरिश के लिए यह क्षण अतिशय आनंदमय थे, वह यह पल ऑंखों में समेटने लगा।
मंथन विनायक देवरे " हिम "