राजनीति की शतरंज का खेल अब रोमांचक मोड़ पर है! वक्त के साथ-साथ अब ‘मैडम’ के ‘हूजरे’ अंधभक्ति की नयी मिसाल पेश करते-करते माँ की आरती गाने लगे हैं ! कल तक उन्हें भरोसा था कि भारतीयों को ‘विदेशी’ का इतना क्रेज़ है कि वो सहर्ष ‘विदेशी बहु’ को स्वीकार कर लेंगे और वह राष्ट्रमाता कहलायेगी, लेकिन हाय रे किस्मत! भारतीयों के दिलों से ‘भारतीयता’ इतनी आसानी से थोड़े ही मरती हैं? सपने ‘दिवास्वप्न’ शाबित हुएँ और युवराज की राजनीती में ‘धमाकेदार’ एंट्री हो गयी!
युवराज के ‘करिश्मे’ तो आप सबके सामने हैं ही! जहाँ-जहाँ मुंह खोला, जनता ने वोट के बटुएँ का मुंह बंद कर दिया! बेचारा युवराज! करे तो क्या करे? माँ के आंसूं की दुहाई दी, गरीब की झोपड़ी में खाना भी खाया, कभी कलावती का सहारा लिया तो कभी गरीबो की थाली में रोटी के नाम पर वोटों की फसल काटने की कोशिश भी की…कभी संविधान की किताब हाथ में लहराई तो कभी देवी-देवताओं के फोटो संसद में दिखाएँ। दिग्गी- राजा, कपिल-क़ानूनी जैसे गुरु के होते हुए भी युवराज राजनीति का ‘क ख ग घ’ भी सीखने में कामयाब नहीं हुए तो आखिर ‘मय्या’ का क्या दोष? बेचारे कितने किलोमीटर की पदयात्राएँ कर आएं.. कश्मीर से कन्याकुमारी तक नाप डाला! बेचारी ‘मदर इंडिया’ थाली में से एक-एक कौर लेकर तो लाडले को खिला सकती है, मगर हजम तो बाबा को ही करना पड़ेगा न!!
पुराने पेड़ के सूखे पत्तो की तरह कई राज्यो में तितर- बितर हुयी कां-ग्रेस का यह खूंट सा हाल देख अच्छे- अच्छो की आँखे भीग गयी (ख़ुशी से या दुःख से यह चिंतन का विषय है) आखिर मातम मनाये तो किसका, निकम्मे, नकारे नेतृत्व का या खामोश तमाशा देखती सरकार का? इतने लॉलीपॉप दिए, इतनी रेवड़ियां बाँटी, इतने सपने बेचे, मगर ये वोटर है कि बार-बार ‘दिल मांगे मोर‘ गुनगुनाता रहता है!! कभी EVM के मत्थे ठीकरा फोडा तो कभी स्वायत्त संस्थाओं के मत्थे... पर इन कां-ग्रेस भक्तो का क्या कहना! वो भक्ति भी करते हैं तो अपने मैय्या के चरणो में दिल-दिमाग गिरवी रख कर ही करते हैं! उनके संकट-मोचक मित्रों का तो क्या कहें!वो मौके पे चौका मारने के लिए तैयार रहते हैं... फर्क सिर्फ इतना है कि कभी इस पाले में बैठ कर या कभी उस पाले में बैठ कर! अभिलाषा यह कि अविरत सोना बरसना चाहिए लक्ष्मी जी के हाथों के सुवर्ण-कलश से! कल ‘किसान पुत्र’ अचानक आँखे मलते हुए जागृत हुए मानो माँ लक्ष्मी जी उन्हें सपनो में आकर दर्शन दे गई हो! उन्हें अब कां-ग्रेस का नेतृत्व कमजोर लगने लगा है..वोटों के लिए कानन-कानन भटकते भटकते अब गुणीजनों को बंगाल की शेरनी याद आने लगी हैं...
डूबते जहाज से कूदने को आतुर भक्तों की अब मानो क़तार सी लगी हैं लेकिन धन्य हैं माँ के भक्तगण! माँ का पुत्र-प्रेम कां-ग्रेस को रसातल की ओर ले जा रहा है लेकिन मजाल है कि कोई चूँ भी करें! सब के सब 'जी हुजूरी’ में PHD किये हुए महानुभाव हैं! न तो उन्हें आत्म-मंथन की जरुरत हैं न आत्म-चिंतन की! अब आखिर परिवारवाद की छाया में पलता ये विस्तीर्ण कां-ग्रेसी वृक्ष नयी सूरज की किरणो के बिना कब तक फलता-फूलता रहेगा? क्या वंशवाद की छाया में, चाटुकारिता के अँधेरे में, सिर्फ संविधान की दुहाई देकर लोकतंत्र का ही गला घोंट कर नयी पौध का सृजन सम्भव है? वटवृक्ष की तरह न तो इसकी जड़े जमीं के भीतर पहुंच कर आम आदमी के दिल की नमीं को ढूँढ पाई है न फिर जमीं की ओर लटकती वटवृक्ष की जटाओं के झूले पर सवार हो लौट पाई हैं! आखिर जमीं से उखड़ चुकी जड़ों वाला यह वृक्ष कब तक वक्त के झंझावातों को झेलेगा? न तो मदर इंडिया इसके अस्तिव को बचा सकती है न राजवंश के चिराग! इन्हे तो सिर्फ आम आदमी के पसीने से सींचने की जरुरत है !
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।