भाग २९
विभा घड़ी के काँटों को देख वक़्त की रफ़्तार को पकड़ने की कोशिश कर रही थी..वक़्त का भी क्या रुबाब हैं... एक बार मूँछ को तांव दे आगे बढ़ गया कि फिर कभी पीछे मूड कर नहीं देखता भले ही पीछे विश्वसुंदरी क्यों न खड़ी हो! तभी दरवाजे की घंटी बजी... विभा ने दरवाजा खोला... "क्या यार! इन्द्र के ऐरावत सी चलती हो? कितना समय लगाती हो दरवाजा खोलने को!" यश बोल पड़ा!
अब विभा कहाँ चुप रहने वाली थी, " धीरज रख वत्स... धीरज रख! धीरज का फल हमेशा मीठा होता हैं... कबीर वाणी सूनी नहीं बन्दे तुमने ? सदियों पहले कह चुके हैं वो...'धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय...' यार! सही समय आने पर ही सब होता हैं..
इनकी जुगलबंदी सुन अप्पा बाहर आ चुके थे... यश भी सोफे पर बैठा ही था कि वज्र और वैदेही ने मुस्कुरातें हुए दिवानखाने में प्रवेश किया! अप्पा को लगा मानों सुबह की सुनहरी किरणे नन्हें-मुन्नो सी खिड़की से आ कर सोफे पर उछलकूद कर रही हैं और वो उन्हें पकड़ने की नाकाम कोशिश कर रहें हैं! अप्पा को आते देख सभी उठ खड़े हुए और प्रणाम कर सोफे पर बैठ गएँ!
विभा क्रिस्टल की प्लेट्स में चिरोटे, चिवडा, चकली और लड्डू ले आई और सभी उस पर टूट पड़े! घर के बने नाश्ते की पारम्परिक चीजों का, वो भी माँ के हाथ की बनी चीजों का स्वाद ही कुछ अलग होता हैं.. न जाने क्यों? पता नहीं क्या-क्या मिला कर बनाती हैं माँ उन्हें! शायद.... थोड़ा सा प्यार का मोहन, डांट-डपट का मिर्च-मसाला, तीखे शब्दों का अजवायन और अक्सर बच्चे के कुशल-मंगल का उत्कट भाव लिए अथक परिश्रम ..तभी तो इतना लजीज होता हैं हर नमकीन, हर पकवान!
देखते-देखते सारी प्लेट्स खाली हो गई ! शिष्टाचार के लिए भी किसीने कुछ नहीं छोड़ा था प्लेटस में! विभा मुस्कुरातें हुएँ चाय बनाने रसोई में गई और पीछे-पीछे वैदेही भी.. दोनों फिर साथ-साथ पानी और चाय की ट्रे लेकर आई!
अप्पा से सब की दिल खोल कर बातें भी हो रही थी! बड़े ही खुशमिजाज़ थे अप्पा! जहाँ भी जाते, छा जाते! राजनीति के धुरंधर थे.. मगर राजनीति को पेशा नहीं, सेवा का साधन मानते थे तभी तो रोज कराड उनके घर में लोगों का जमावडा लगा रहता था! लोग अपनी छोटी -छोटी समस्याएँ लेकर आते और अप्पा उन्हें आसान समाधान देकर खुश करते, जहाँ आर्थिक मदद की जरुरत महसूस होती वहाँ मदद भी करते ! न तो उनकी कथनी-करनी में अन्तर था न कहीं स्वयं का स्वार्थ! न उन्हें अपनी सात पीढियों के भविष्य का इंतज़ाम करना था न अपने रिश्तेदारों का कल्याण...तभी तो गांव के लोग उन्हें मान-सम्मान और इज्जत देते थे!
चाय की चुस्कियों के साथ उनकी बातें भी जारी थी! अप्पा ने सभी को हॉस्पिटल में ज़िन्दगी की कठिन जंग बड़ी हिम्मत से लड़ते देखा था! सरकारी अस्पताल की जटिल प्रक्रिया तथा परेशानियों से वे वाकिब थे! उन्होंने बच्चों को जी-भर कर दुआएं दी और विदा ले ही रहें थे के वज्र पूछ बैठा, " अप्पा! तुम्ही अचानक मुम्बई ला कशे? काही काम काढलं का?"
अप्पा गुपित बताना नहीं चाहते थे लेकिन सब की प्रश्न-वाचक मुद्रा देख वह बोल पड़े,"अरे! उद्या स्वास्थ्य मंत्री येणार आहेत मुम्बई ला!" सोचा! कराड में एक बड़ा निजी अस्पताल बनवा दूँ जहां सभी बड़ी-बड़ी मशीने लगी हो, विशेषज्ञ चिकित्सक हो... गरीब को भी हर सुविधा मिले.. उसी अस्पताल के शिलान्यास की अनुमति लेने आया हूं! सरकारी जमीन तथा अनुदान भी मिलेगा तो काम जल्दी हो जायेगा! देखते हैं...सपना साकार होता हैं या नहीं... सभी ने तालियों से अप्पा के विचारों का स्वागत किया... अप्पा! जरूर होगा! नेक काम में भगवान भी साथ देता हैं! हमारी भी मदद चाहिए तो कहना.. हर क्षेत्र में.. हम जी-जान लगा देंगे!
सभी का धन्यवाद ज्ञापन कर अप्पा पास के कमरे में चले
गए और मित्र-मण्डली अपने काम में लग गई! आज वज्र जींस-टीशर्ट पहन कर आया था! दो-बार फॉर्मल्स पहन कर आया तो वह सिर्फ पूछते रह गया, " मेरा नंबर कब आएगा.. यारों! मेरा नंबर कब आएगा?"
गहरे नेवी ब्लू टी-शर्ट और हल्की नीले रंग की जींस में वह बहुत ही हैंडसम लग रहा था! यश का तो क्या कहने.. चौड़ा कन्धा, उभरे सिक्स पैक्स और गेहूं सा चमकता चेहरा! काले टीशर्ट पर सफेद व्याघ्र का चित्र और स्लेट रंग की जींस! मिश्किल हँसी... मानों उसे देख कर कोई हँसी...तो फंसी! वैदेही का तो क्या कहना.. सादगी ही था उसका गहना.. चेहरे पर हल्की सी मुस्कान, मोगरे के फूल सा रंग और चेहरे पार गज़ब की मासूमियत मानों शांत बहती सरिता और विभा.. निहायत ही खूबसूरत, नए-नए परिधानों की शौक़ीन, चंचल मृग-नयनी शोडषि ! सबका अपना-अपना अंदाज, अपना-अपना स्टाइल!
विभा ने स्टडी टेबल पर रक्खी अपनी डायरी खोली.. डायरी के पन्ने हवा के साथ उलट-पुलट हो रहें थे.. विभा ने नुक्कड़ नाटक के संवाद का पन्ना खोला! अब विभा, वैदेही के संवाद थे और उसके बाद वज्र के! विभा अब मदारी की पत्नी शकु का किरदार निभा रही थी और वैदेही उसकी मालकिन का जहाँ पर वह काम करती थी!
विभा अब मदारी की पत्नी शकु बन गई थी.. रस्सी पर चलने में उसे महारत हासिल थी! एक बांस के टुकड़े से हवा में डोलती रस्सी पर अपना तारताम्य बना कर चलना हो या 'ठन ठन गोपाल' गृहस्थी का तालमेल बैठाना हो.. वह दोनों में अव्वल थी! उसने पुरानी रेशम किनारी और फटे पल्लू वाली इरकली साड़ी पहनी थी! बिना तेल लगे उसके बाल बिखरे-बिखरे से थे.. वह कमरे में पल्लू पीछे बांध कर झाड़ू लगा रही थी और मैडम जी के रोल में वैदेही पंजाबी सूट पहन कर, सोफा पर लेट कर किताब पढ़ रही थी! शकु ने झाड़ू लगाते-लगाते पूछा, " मैडम जी! मेरा मालक हैं न.. मन्या... उसके दिमाग़ में एक भूत घुस गया है! उसे अमर होने का हैं..क्या झाड-फूँक से ये भूत निकल सकता है? क्या बाबा को चढ़ावा चढाने से वो अमर हो सकता हैं? मैं समझा-समझा के थक गई मैडम जी...
मैडम जी मुस्कुराई... "अरे पगली! जो आया हैं इस दुनिया में, उसकी मृत्यु निश्चित हैं...ये सब तुम्हें उल्लू बना कर अपना उल्लू सीधा कर रहें हैं! न कोई बाबा शकुनि अमर बना सकता हैं तुम्हें और तुम्हारे मन्या को और न कोई मुल्ला-ओझा! एक रास्ता हैं... अगर तुम अंधश्रद्धा छोड़ कर सही दिशा में काम करोगी तो तुम और तुम्हारा मन्या अमर हो सकते हो.. कल डॉ. वज्र पाटकर आयेंगे यहाँ! मैं उनसे तुम्हारी बात करवाती हूं! जरा साफ़-सुथरा होकर, बाल ढंग से बना कर आना! वो तुम्हें समझाएँगे... ठीक हैं न शकु?
शकु आज बहुत खुश थी! उसे मन्या की बेचैनी को दूर करने का नुस्खा कल मिलने वाला था! न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी! न प्रश्न रहेगा न मन्या की उदासी! वह खुशी-खुशी मैडम ने दी हुई बासी रोटियाँ और सब्जी लेकर घर की ऒर चल पड़ी...
सभी ने तालियों की गड़गडाहट से उनकी हौसला अफजाई की... दोनों का अभिनय उत्कृष्ट था! सभी नाटक का प्रस्तुतिकरण देख खुश थे! आज भी वज्र की प्रस्तुति बाकी रह गई थी...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोज सुराणा, मुम्बई |
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