ईश्वरीय शक्ति..

अस्ताचल का सूरज दूर सफ़र पर निकल चूका था! आसमान में फैली लालिमा आँखों से हौले-हौले ओझल हो रही थी और रात श्यामल चंद्रकला ओढ़ दबे पाँव आ रही थी! 

कॉलेज का वार्षिक उत्सव ख़त्म हो चूका था और सभी साथी घर लौटने की जल्दी में थे! मैंने मंच पर एकल नृत्य नाटिका प्रस्तुत की थी! सभी ने उसे तहेदिल से सराहा! स्मृतियों की रेशमी गठरी लेकर मैं निकल पड़ी थी अपने आशियाने की ऒर...अपनी साईकल पर!

हवा से बातें करते-करते मैं कल्पना-लोक में पहुँच चुकी थी! कॉलेज की प्रधानाचार्या ने खुद आकर मेरी पीठ थपथपाई थी और दिल खोल कर मुझे आशीर्वाद दिए थे! मैं अभिभूत थी.. नि:शब्द थी मानों ऊपरवाले ने सारी खुशियाँ, सारी दुआएं मेरी झोली में डाल दी थी! पवन के झोंके मेरी जुल्फों से खेल रहे थे और सडक के किनारे लगे बिजली के खम्बे मुझे घर से दूरी का हिसाब-किताब समझा रहे थे! मैं खुशी में झूम रही थी और अपनी सफलता पर इतरा रही थी तभी मुझे लगा कि मेरी साड़ी खींची जा रही है और साईकल चलाना मुश्किल हो रहा है..

मैंने अनहोनी को भाँप कर साईकल को सडक किनारे ले कर उतरने की कोशिश करने लगी पर हाय री किस्मत! साड़ी साईकल की चेन में अटक चुकी थी और जैसे-जैसे मैं उसे निकालने का प्रयास करती, वह फट जाती! 

यह डिज़ाइनर साड़ी, दो दिन पहले ही मद्रास से आई मेरी मौसी ने लाई थीमेरी लिए..अपनी लाडली भाणेजी के लिए!

दोनों बहनें आपस में बतियाती रही .. "बड़ी हो गई है बेटी ... कोई अच्छा लड़का ध्यान में आये तो.."

मैंने आनेवाले तूफ़ान का अंदाजा लगा वहाँ से खिसकना ही बेहतर समझा और चल पड़ी मैचिंग ब्लाउज-पेटीकोट ढूंढ़ने!

कितना प्यारा था साड़ी का रंग... गुलाबी.. गुलाबी! सालाना कार्यक्रम में पहन कर जब मैं गई तो सभी ने मुस्कुरा कर चुटकियाँ ली! "क्या बात है? आज एकदम गुलाबी.. गुलाबी"

पता नहीं क्यों! जब भी कोई चीज हमें बहुत पसंद आती है, कुछ न कुछ हो ही जाता है! पता नहीं किसकी बुरी नज़र लगी थी! साड़ी बिच-बिच में ही जगह-जगह बुरी तरह फट गई थी और हाथ और साड़ी दोनों ही ग्रीस से लिपट चुके थे!

पास से गुजर रही एक युवती ने जब मेरी जद्दोजहद देखी तो वह भी सब्जी की थैलियां एक ऒर रख मुझे मदद करने लगी! मानों भगवान ने उसे मेरी मदद करने के लिए ही भेजा था! 

रात के दस बज चुके थे और रास्ते पर इक्का-दुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे! ग्रीस से लिपे हाथ, चिंधी-चिंधी साड़ी और चेहरे पे काले ग्रीस के धब्बे.. मैंने साईकल पे दाहिनी ऒर लगे छोटे से दर्पण में खुद को देखा और स्वयं ही डर गई!

तभी वह अजनबी लेकिन प्यारी सी लड़की बोल पढ़ी, "दीदी! मेरा घर पास में ही है.. चलो! वहां चलकर फ्रेश हो कर फिर चले जाना आप अपने घर 

.. मैं यहीं पास में रहती हूँ.. उस बंगले में !"

आँखें मिचमिचाती स्ट्रीट लाइट को देख मन में कई खयाल एक साथ मुझसे रस्सा-कस्सी खेलने लगे! अनजान लड़की के साथ कैसे चली जाऊं? अभी तो घर बहुत दूर है.. कैसे जाउंगी ऐसी हालत में घर? अचानक माँ इस हालत में देखेगी तो क्या सोचेगी? 

मं का सीना cheer

मैं उस लड़की के साथ चलने लगी! मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार की लड़की थी वह! दरवाजे पर गणेश जी प्रतिमा देख मेरी जान में जान आई! उसकी माँ ने मुझे देख कर बाथरूम की ऒर जाने का इशारा किया! अलमारी से साड़ी का पूरा सेट और एक टॉवेल देकर उसने बेटी को मेरा ध्यान रखने के लिए कहा और चल पड़ी रसोईघर में!

चाय-बिस्कुट खिला कर उन्होंने मुझे विदा किया! "छोड़ने आऊ क्या? बेटी और माँ साथ में ही बोल पड़ी!

मैं नि:शब्द थी! एक अनजान परिवार का इतना प्यार.. इतना विश्वास? दुनिया में भलमानसियत अभी भी जिन्दा है...मैंने सायकल रिक्षा में रखवाई उनकी मदद से और चल पड़ी अपने घर की ऒर...दो दिन बाद उन्हें साड़ी लौटने का वादा कर! 

जीवन में पहली बार मुझे ईश्वरीय शक्ति का एहसास हुआ! कण-कण में रच्चनहारे की उपस्थिति का विश्वास हुआ!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!

 

 

 

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